वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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तत्त्वदेशना की समग्र समीक्षा
                                                                                                               
-वृषभ प्रसाद जैन

जब से संगोष्ठी का आमंत्रण मिला, बस तभी से मन में एक सवाल उठता रहा कि ‘‘तत्त्वदेशना की समग्र समीक्षा’’ पर आलेख प्रारंभ करने के लिए बात कहाँ से प्रारंभ की जाए- तत्त्वों की देशना से, या-फिर तत्त्वदेशना से या तत्त्वसार पर तत्त्वदेशना की समग्रता में समीक्षा से। एक बार मन में उठा कि पहली दृष्टि से बात करो और अलग हो जाए, पर फिर यह लगता कि यह बात तो शायद क्या, सही मायने में विषय पर पूरी न हो पाएगी, इसलिए तत्त्वदेशना की देशना पर बात और कर ली जाए, तो अच्छा रहे, पर इस विचार के बाद भी लगा कि इतनी बात करके भी विषय पर पूरी बात न हो पाएगी, अतः मन में आया कि आलेख में तत्त्वसार पर तत्त्वदेशना की बात भी की जानी चाहिए और लेख लिखने के लिए उद्यत होने ही जा रहा था कि इतनी सब दृष्टियों से यदि आलेख में बात की जानी है, तो कम से कम छः माह का समय चाहिए और तीन-तीन घंटों वाले तीन सत्र चाहिए, तब कहीं कुछ अंशों में उक्त विषय पर न्याय हो सकेगा, तो सोचा कि अब यह संभव नहीं, इसलिए श्री विशुद्धसागर महाराज जी की कई गोष्ठियों में आ गए, अब इस बार बात कुछ न की जाए और यात्रा छोड़ी जाए और उधर खजुराहो की अंतरराष्ट्रीय कांफ्रेंस के उद्घाटन का आमंत्रण भी आ गया तो छोड़ने का मन बना ही रहा था, तो यहाँ के आयोजकों के फोन पहुँचने लगे, खासकर श्री सत्येन्द्र भाई का, तो फिर लगा कि चलना चाहिए और ग्रंथ पढ़ने बैठ गया और पढ़ने पर आप सब जानते ही हैं कि आचार्य विशुद्धसागर जी ऐसे विलक्षण प्रतिभा वाले आचार्य हैं कि बात प्रारंभ करते हैं, तत्त्वसार पर चर्चा के बहावे पर तत्त्वदेशना प्रस्तुत करते-करते डुबकियाँ लगा देते हैं, सम्पूर्ण जैन वाङ्मय में, और डुबकियाँ लगाते-लगाते पाठक स्नानतुकाम जिज्ञासु तैरने लगता पूरी अध्यात्म-सरिता में और इस तैरने की प्रक्रिया में, तारण-तरण के क्रम में और इस तैरने की प्रक्रिया में, तरण-तारण के क्रम में कई बार ऐसा लगता है कि वह तैर ही नहीं रहा, बल्कि तिर रहा है, जैसे शायद अरहंत अवस्था के बाद अघातियों कर्मों के काटने की प्रक्रिया में तिर रहे होते हैं अरहंत परमेष्ठी और कर्म छूटे, तो सटाक पहुँच गए चरम लक्ष्यसिद्ध शिला में, इसलिए कई बार ऐसा कर्म कर रहे हैं और हम तिर रहे हैं निष्कलंक अवस्था की ओर, पर कई बार ऐसा भी लगता है कि तत्त्वदेशना में तैरना और तिरना तो नहीं, तारने की-पार उतारने की धारा भी चलती है, या धारा पूरी तत्त्वदेशना में चलती दिखती है, पर धारा तब चलती है, जहाँ आचार्य श्री अपने पाठक स्नानुकाम जिज्ञासु को सम्बोध रहे होते हैं, ऐसी स्थिति पूरी रचना में बहुशः और अनेकशः दिखती है।

यह तिरने, तरने और तारने की बात तत्त्वदेशनाकार आचार्य विशुद्धसागर तत्वसार के रचयिता आचार्य देवसेन का अनुकरण कम कर रहे होते हैं। ‘‘नमिऊण’’ जिसका अर्थ है नमस्कार करके, भाषा में जिसे नमस्कार किया जाता है, उस लक्ष्य के लिए द्वितीया या चतुर्थी का प्रयोग होता है, पर ‘‘नमिऊण’’ के सम्बद्ध तीनों पदों में द्वितीया और चतुर्थी नहीं है, ध्यान से देखें तो यह साफ होता है कि वहाँ आधार सप्तमी का प्रयोग आचार्य देवसेन ने किया है, क्योंकि वहाँ आचार्य देवसेन का लक्ष्य नमस्कार क्रिया इप्सित तप के रूप में उन पदों के प्रयोग में नहीं है। और यदि वैसा होता तो नमस्कार क्रिया प्रधान हो जाती और उसके ईप्सित तप हो जाते तीनों पद- परम सिद्धे और उसके दोनों विशेषण, पर रचनाकार वैसा नहीं करना चाहते, इसीलिए वे आधार सप्तमी का प्रयोग करते हैं परसिद्ध और उसके विशेषण पदों के साथ, क्योंकि उनका वहाँ लक्ष्य है कि वे उन्हीं को नमस्कार करना व कराना चाहते हैं, जो परम सिद्ध हैं, पर जिन्होंने परम सिद्धत्व प्राप्त किया है ज्ञान रूपी अग्नि में कर्म रूपी मल को दग्ध करके, इसलिए तो वे निर्मल व सुचारु रूप से व्यवस्थित शुद्धि रूप अर्थात् सुचारु विशुद्धि रूप स्वभाव को प्राप्त अवस्था वाले सिद्धों को नमस्कार करके ही इस तत्त्वसार ग्रंथ की रचना करना चाहते हैं। खास बात यह है कि रचनाकार बहुत साफ शब्दों में यह कहना चाहते हैं कि अध्यात्म का चरम लक्ष्य पर सिद्ध प्राप्त ही तब होता है, जब अध्याथ्त की द्विविध धारा चलती है। यह द्विविध धारा इसलिए है, क्योंकि इसमें एक ओर कर्म रूपी मल दग्ध हो रहा होता है और दूसरी ओर सुचारु एवं व्यवस्थित शुद्धि के अनन्तर निर्मल आत्म-स्वभाव प्राप्त हो रहा होता है। तत्त्वसार देशना को अध्यात्म-धारा की विशेषता यह है कि यह सैद्धान्तिक के साथ-साथ अध्यात्म-साधना के व्यावहारिक पक्षों पर भी बात करती है या उसे भी समुचित रूप में सामने रखती है, पर ऐसा करने में वह तात्त्विक रूप से कहीं चूकती नहीं-इसीलिए तो देशनाकार कहते हैं- ‘‘आत्मा की ध्रुव सत्ता ज्ञायक स्वरूप है, अतः यह ग्रन्थराज मुमुक्षु जीवों के अज्ञान-तिमिर का नाशक है।’’ इसी मंगलाचरण में सर्वार्थसिद्धि के उद्धरण से देशनाकार कहते हैं कि ‘‘मिट्टी के नवीन सकोरा में पानी की एक बूँद डालने पर वह दिखती नहीं, तो क्या वह पानी की बूँद सकोरे में नहीं है ?...... है, परंतु सकोरे की नवीनता के कारण वह अन्दर प्रवेश कर गई, दिखती नहीं है। जैसे-जैसे पानी पड़ता जाता है, वैसे-वैसे वही पानी दिखने लगता है। इसप्रकार जब हम प्रारब्ध अवस्था में तत्त्वज्ञान को सुनते हैं, तब कुछ मालुम नहीं पड़ता, पर जैसे-जैसे अध्ययन बढ़ता जाता है, वह ज्ञान विद्वान् के रूप में प्रकट होने लगता है/हो जाता है। साथ ही, सिद्धान्त कहता है कि जिनवाणी के श्रवण मात्र से असंख्यात गुण श्रेणी कर्मों की निर्जरा होती है।’’ आप देखिए किने सहज रूप में देशनाकार ने जिनवाणी का सिद्धान्त भी सामने रख दिया और अध्यात्म से जुड़ने की व्यावहारिक प्रक्रिया भी बता दी पाठक/श्रोता को। इसलिए मुझे तो लगता है कि तत्त्वदेशनाकार तत्त्वदेशना में वक्त अध्यात्म प्रायोगिक/व्यावहारिक भी है और सैद्धान्तिक भी। इसकी चरम परिणति मंगलाचरण में देखिए इन शब्दों में- ‘‘व्यवहारन्वय में पंच परमेष्ठी नमसकारणीय हैं, निश्चय नय से निज आत्म वंदनीय है, परंतु परम शुद्ध निश्चय नय से न कोई वंद्य है, न वंदनीय है। वंद्य-वंदकभाव व्यवहार दृष्टि से है।’’ मंगलाचरण के प्रसंग को आप और ध्यान से देखिए तो एक बात और निकलकर आती है कि देशनाकार ने मंगल के भेदों की खूब चर्चा की है, पर यहाँ ‘‘मंगलाचरण क्यों?’’ की बात पता नहीं किन कारणों से छूट गई है, क्योंकि मंगल के भेदों की जब बात ही कहीं है, तो वहीं मंगलाचरण की प्रयोजनीयता पर भी बात की जाती तो ग्रंथ के मंगलाचरण के प्रसंग का चमत्कार थोड़ा और बढ़ जाता।

दूसरी गाथा की देशना पूरी तत्त्वदेशना को मुझे लगता है कि आधार देनी है तथा यह तथ्य भी उजागर करती है कि जैन वाङ्मय के विभिन्न ग्रंथ तात्त्विक दृष्टि से परस्पर कैसे अनुस्यूत हैं, इसीलिए तो वे बात कर रहे हैं, तत्त्वसार की पर बार-बार प्रसंग उठाते हैं सर्वार्थसिद्धि से, पूज्यपाद स्वामी से परमात्मप्रकाश से, छहढाला से या कुछ और ग्रंथों से, ग्रंथकारों से। मेरे मन में एक सवाल उठा कि ग्रंथकार का/देशनाकार लक्ष्य है तत्त्वसार पर देशना करना, तब फिर वे प्रसंग सर्वार्थसिद्धि से आखिर क्यों उठाते हैं?....... उसे नहीं उठाना चाहिए था, पर जैसे ही मैं ‘‘तत्त्वसार’’ और ‘‘तत्त्वदेशना’’ दोनों के दूसरी गाथा के उद्धरण को पढ़ता हूँ तो प्रश्न का उत्तर अपने-आप मिल जाता है, उत्तर है कि तत्त्व बहुभेद वाला है और उसे बहुभेद वाला इसलिए कहा गया है क्योंकि प्रयोजन है पूर्वोचार्यों के द्वारा धर्म के प्रवर्तन करने का और भव्य जीवों को समझाने का; कुल मिलाकर बात यह हुई कि तत्त्वसार में तत्त्व के बहुभेदों का वर्णन तो है, पर तत्त्व क्या है, इसे तत्त्वसारकार आर्चा श्री देवसेन जी ने स्वयंसिद्ध मान लिया या परंपरा-सिद्ध मान लिया, इसलिए उसकी व्याख्या नहीं की और परंपरा में जब देखा तो व्याख्या उसकी मिल गई सर्वार्थसिद्धि में और यदि वे उसे फिर रख देते तो पुनरुक्ति भी हो तो और परंपरासिद्ध को प्रस्तुत न कर पाने की बात भी न हो पाती; इससे वे बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वैसा तत्त्वसार को रचते समय नहीं किया, पर श्री विशुद्धसागर जी को लगा कि जो परंपरासिद्ध तत्त्व की अवधारणा की बात है, उससे वर्तमान काल के लोग लगभग अपरिचित-से हो गए हैं, इसलिए यदि सर्वार्थसिद्धि के उद्धरण के साथ उस कथ्य को/तथ्य को यहाँ कह दिया जाएगा, तो विषय भी आज के पाठक को साफ हो जाएगा और परंपरा की सिद्धि की बात भी आज के पाठक के सामने प्रस्तुत की जा सकेगी। इस पूरे प्रसंग से यह तथ्य भी उभर कर आता है कि जहाँ-जहाँ तत्त्वदेशनाकार ने अन्य आचार्यों से, अन्य रचनाओं से उद्धरण दिये हैं, उसके निम्न प्रसंग हैं-
अ- परम्परा-सिद्ध को प्रस्तुत करने की। ब- अन्य आचार्य के मत को रखने की। स- ग्रंथ में न कहे जा सकने वाले को वर्तमान में सम्मुख रखने की। द- अपने कथन की पुष्टि के लिए, ताकि कहीं ऐसा न कह जाया जाए, जो जिनमत के विरुद्ध है या हो....... आदि।

पर इस पूरी प्रक्रिया में देशनाकार का लक्ष्य इस बात पर रहा है कि अध्यात्म की धारा पूरी रचना में अविकल बहती रहे, उसे बहाव में कहीं कोई बाधा न आए/रुकावट या अड़चन न आए। तत्त्वसार को पढ़ने से कई बार ऐसा भी लगता है कि तत्त्वसारकार आचार्य देवसेन केवल तथ्य कह रहे हैं या प्रक्रिया-भर बता रहे हैं, वहाँ अध्यात्म की धारा बात नहीं, जैसे-उदाहरण के लिए लीजिए, मैं जब 15वीं गाथा पढ़ रहा था, तो मुझे लगा कि यह तो मात्र तथ्यात्मक कथन है या प्रक्रियागत स्थिति का कथन है, इसमें अध्यात्म या ध्यान में रत रहने की बात कहाँ?..... पर जैसे ही आप देशना पढ़ते हैं, तो देशनाकार अध्यात्म की धारा में ही आपको नहीं लाते, बल्कि अगाह करते हैं अध्यात्म से विमुख होने से और लाकर रख देते हैं पुनः अध्यात्म की धारा में।
दूसरी गाथा की देशना के आप निम्न उद्धरणों को देखिए, - सर्वार्थसिद्धि के प्रसंग से देशनाकार कहते हैं-

अ- ‘‘तत्त्व शब्द भाव-सामान्य का वाचक है, क्योंकि ‘‘तत्’’ सर्वनाम पद है, और सर्वनाम सामान्य अर्थ में रहता है, अतः उसका भाव ‘‘तत्त्व’’ कहलाता है- ‘‘तस्य भावस्तत्त्वम्’’। किसका भाव है?.... वस्तु का; यानि जो वस्तु का स्वभाव है, वही तत्त्व है। यहाँ तत् शब्द से कोई भी पदार्थ लिया गया है। आशय यह है कि जो पदार्थ जिस यप में अवस्थित है, उसका उस रूप होना ही ‘तत्त्व’ शब्द का अर्थ है।’’ (तत्त्वदेशना, पृ. 5)

उपर्युक्त पंक्तियों में तत्त्व की कितनी साफ, स्पष्ट व सैद्धान्तिक व्याख्या की है, देशनाकार ने सर्वार्थसिद्धि का आधार लेकर, जिसे उन्हें प्रायोगिक रूप में या व्यावहारिक रूप में पुष्ट करना है आगे की व्याख्या से। सिद्धान्त भी साफ, विचार भी साफ, पोषण भी साफ, परंपरा का स्मरण भी साफ उद्धरण के माध्यम से।

ब. ‘‘भो ज्ञानी ! पदार्थ का धर्म त्रैकालिक होता है, वह कभी भी विनाश को प्राप्त नहीं होता, मात्र पर्याय का ही परिणमन होता है। अज्ञानी जीव पर्याय के परिणमन को ही पदार्थ का अभाव मानकर विलखता है, कभी प्रसन्न होता है, पर यह नहीं समझता कि अविनाशी न कभी विनाश हुआ है, न होगा, न हो रहा है। परिणमन तो वस्तु का स्वभाव है, वह षड्विध हानि-वृद्धि रूप चल रहा है। पर्याय-दृष्टि से उपजना, नष्ट होना कोई आश्चर्य की बात नहीं। यह तो पदार्थ का अनादि धर्म है। उस धर्म को समझना ही वास्तविक तत्त्व-निर्णय है। तत्त्व को पढ़ लेना, पढ़ा देना, सामान्य विषय है। इस क्रिया से कभी भी शांति प्राप्त नहीं होती। शांति तो तत्त्व-निर्णय से प्राप्त होती है। क्या-क्या, कैसा-कैसा परिणमन चल रहा है? द्रव्य में द्रव्य रूप, गुण में गुण रूप, पर्याय में पर्याय रूप त्रयरूपता होना, फिर भी एकरूपता दिखती है, क्योंकि द्रव्य को ही देखते हैं, अन्य को नहीं।’’ (तत्त्वदेशना, पृ. 5)

स. ‘‘जब स्वभाव परिणमन हो जाता है, फिर विभाव रूप परिणमन जीवद्रव्यों में कभी नहीं होता। वह दग्ध बीजवत् हो जाता है। जैसे जो बीज जल गया हो, वह अंकुरित नहीं होता, उसीप्रकार जिस जीव के कर्म-बीज दग्ध हो चुके हैं, वह पुनः संसार में संसारी बनकर उत्पन्न नहीं होता। वह सिद्ध अवस्था को प्राप्त हो जाता है अर्थात् शुद्ध चेतना को प्राप्त हो जाता है, परंतु चेतना का अभाव नहीं होता, क्योंकि जीव पदार्थ का स्वभाव चेतना है, अतः सवभाव स्वभावी में त्रैकालिक रहता है। स्वभाव को प्राप्त हो जाना ही तत्त्वसार है।’

द. अवधिज्ञान और मनः पर्यय ज्ञान व ऋजुमती और विपुलमती के अन्तर को बड़ी सहजता एवं सरलता से बताते हैं आचार्य श्री विशुद्धसागर। उद्धरण देखिए-
‘‘मन के अन्तःकरण में प्रवेशकर सूक्ष्म दृष्टि से चिंतवन कर देखने पर मालूम चलेगा कि मन कितनी तीव्र गति से गतिमान् है। किस-किस प्रकार से कहाँ से कहाँ जा रहा है?..... क्षण में भवन में क्षण में वन में। अवधिज्ञान तो विषय ही नहीं है मन, परंतु मनःपर्याय ज्ञानियों में कुटिल मन के विषयों को ऋजुमती मनःपर्ययज्ञानी भी नहीं पकड़ पाते। हाँ, विपुलमती मनःपर्ययज्ञानी वक्र से वक्र, सरल से सरल दूसरे के मनोगत विषयों को जानते हैं तथा चिंतित, अर्धचिंतित एवं अचिन्तित मन के विषयों को पकड़ लेते हैं। भो ज्ञानी ! मन की विचित्रता को देखो, जो जीव जिस विषय को कभी नहीं जानता था, वहाँ भी पहुँच जाता है। पवित्र कार्य अल्पगति से करता है, परंतु अशुभकार्य में शीघ्र गमन कर जाता है, क्योंकि मन की चपलता विद्युत से भी तेज है।’’ (तत्त्वदेशना, पृ. 6)
तत्त्वदेशना में पूर्व परंपरा का निर्वहन पग-पग पर देशनाकार ने किया है, अतः वह इस कार्य में बहुत सचेत रहा है, बात इतनी ही नहीं, वह तो कहता है कि उसकी परंपरा भी ऐसी ही थी, स्वयं उन्हीं के शब्दों में-

य- ‘‘इसप्रकार ग्रंथकार देवसेन महाराज कह रहे हैं कि तत्त्व अनेक भेद रूप है यह तत्त्व जो मैंने तत्त्वसार ग्रंथ में लिखने का विचार किया है अथवा पूर्वाचार्यों ने कहा है- वह यश, पूजा के लिए नहीं लिखा, अपितु भव्य जीवों के लिए तत्त्व बोध कराने तथा धर्म के प्रवर्तन हेतु लिखा है। जब तक तत्त्वज्ञान न होगा, तब तक तत्त्वदृष्टि न बनेगी। वह तत्त्वज्ञान सद्शास्त्रों के अध्ययन, मनन, चिंतवन से ही संभव है, तत्त्वज्ञान से युक्त ज्ञानी-जनों के माध्यम से ही धर्म का प्रवर्तन होता है। बिना ज्ञान के धर्म का प्रचार नहीं हो सकता। (तत्त्वदेशना, पृ. 6)

मैंने कुछ ऊपर सहज उक्ति की बात कही थी, यह सहज उक्ति की प्रक्रिया केवल एक गाथा तत्त्वदेशना में या एक प्रसंग में हुई हो, -यह तथ्य नहीं है। गाथा, 6 के प्रवचन में आप ध्यान, ध्याता और ध्येय के अन्तर की व्याख्या देखिए-
‘‘जिसे किया जा रहा है- वह ध्यान है। जो कर रहा है- वह ध्याता है। जिसका ध्यान कर रहा है- वह ध्येय है।
इसी गाथा की व्याख्या का वे अंत करते हैं- ‘‘निश्चय-से निज आत्मा और व्यवहार से पंच परमेष्ठी ध्येय हैं, तीसरा कोई ध्येय नहीं है। जो तीसरे ध्येय की बात करता है, वही मिथ्यादृष्टि है। इसीलिए दृष्टि को स्वरूप पर ले जाना, रूप पर मत ले जाना, वरना दिल रखना पड़ेगा। जिनवाणी ठहरने की बात करती है, अतः पर से हट जाओ, निज में ठहर जाओ। यही तो संयमाचरण है, यह संयमाचरण ही स्वरूपाचरण में प्रवेश करा पाएगा।’’
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