वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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“श्री-क्षेत्र श्रवणबेलगोला स्थित बाहुबली प्राकृत विद्यापीठ (रजि.)”
द्वारा संचालित राष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन एवं संशोधन संस्थान की ओर से
दिनांक 24 से 28 दिसम्बर 2014 तक के मध्य आयोजित

“चन्द्रगिरि शिलालेख और प्राकृत साहित्य परम्परा” विषयक राष्ट्रीय प्राकृत संगोष्ठी का
उद्घाटन-व्याख्यान: प्रोफेसर वृषभ प्रसाद जैन

श्रद्धेय जगद्गुरु भट्टारक स्वस्ति-श्री चारुकीर्ति महास्वामी जी महाराज, इस कार्यक्रम के अध्यक्ष और मेरे परम आदरणीय प्रोफेसर डॉ. राजाराम जी, मठ के अन्य न्यासी एवं पदाधिकारी-गण, राष्ट्रीय प्राकृत अध्ययन एवं संशोधन संस्थान के मान्य न्यासीगण, निदेशक महोदय एवं अन्य पदाधिकारी-गण, इस संगोष्ठी में आये विभिन्न वरिष्ठ एवं कनिष्ठ विद्वज्जन, साधर्मी बन्धुओ, माताओ एवं बहनो!
आप सब के जिन-धर्मानुरागी चरणों व सान्निध्य में प्रणति, जय गोमटेश एवं जयजिनेन्द्र निवेदित करते हुए सबसे पहले मैं आपके सम्मुख विनम्र भाव के साथ यह कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ कि आप श्रीमान्, धीमान् व ज्ञानी-जनों ने मुझ अकिंचन को इस संगोष्ठी के उद्घाटन के अवसर पर आप सब की गरिमामयी उपस्थिति में कुछ विचार-बिन्दु प्रस्तुत करने का अवसर दिया, जबकि आप यह अच्छी तरह जानते हैं कि न तो मैं चन्द्रगिरि के शिलालेखों का विशेषज्ञ हूँ और न प्राकृत-साहित्य-परम्परा का ही, फिर भी इस बीच चन्द्रगिरि के शिलालेखों को आदरणीय प्रो. हीरालाल जी जैन के नागरी लिप्यन्तरण एवं उनके बारे में किये गए संक्षिप्त टिप्पणों के आधार पर व पिछले कुछ समय से प्राकृत-साहित्य पर डाली गई विहंगम दृष्टि से सामान्य अध्ययन करने वाले अध्येता के रूप में जो-कुछ बातें मेरे मन-मस्तिष्क में उभरी हैं, उन्हें मैं आप-सब के बीच में बाँटना चाहता हूँ, ताकि इस संगोष्ठी की सार्थकता में मैं भी अपनी कुछ भागीदारी कर सकूँ।
भारत की महत्ता भारत की संस्कृति से है और यह संस्कृति भारत की भाषाओं, कलाओं व विद्याओं में निहित है, इसीलिए भाषाओं, कलाओं व विद्याओं और संस्कृतिओं का बड़ा अटूट संबंध माना गया है तथा यही कारण है कि इस भारतीय संस्कृति की आधिकारिक बाहिका कोई एक भाषा-भर नहीं हो सकती या नहीं मानी जा सकती, बल्कि इसकी बाहिका भारत की सभी भाषाएँ बनती हैं व हैं; बल्कि भारत की ही नहीं, बृहत्तर भारत की सभी भाषाएँ इन प्राकृतों से किसी न किसी रूप में जुड़ी हैं, इसीलिए प्राकृतों और उनमें निबद्ध सामग्री को नकार कर भारतीय संस्कृति का सर्वांगीण अध्ययन नहीं हो सकता या नहीं किया जा सकता, बल्कि यदि इन प्राकृत भाषाओं को भारतीय संस्कृति का केंद्रीय उत्स कहा जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी, पर अभी तक हमने भारतीय संस्कृति के साथ के इन भाषाओं के रिष्तों का अध्ययन ऍथ्नो लिंग्विटिक्स के साँचे में नहीं किया है, जो बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। आप योरुप और अमरीका की छोटी-छोटी भाषाओं के साहित्य को देखें, तो आप पाएँगे कि लंबे अन्तराल पूर्व उन पर ऐसे अध्ययन हो चुके हैं और जो प्राकृत भाषा लगभग सभी भारतीय भाषाओं की केंद्रीय उत्स रही हो या उनसे किसी न किसी रूप में संबद्ध रही है और अभी उसी पर ऍथिनक अध्ययन न हुआ हो, तो अन्य भारतीय भाषाओं की बात क्या की जाए?.... बात इतनी ही नहीं, भारतीय इतिहास की बड़ी-बड़ी हामी भरने वाले लोगों के द्वारा भी इन प्राकृतों की भाषायी संपदा को लेकर भारत-ईरानी व भारत-कष्मीरी समस्याओं को लेकर भी ऐतिहासिक भाषाविज्ञान या क्षेत्रीय भाषाविज्ञान के साँचे में काम नहीं किया जा सका है, यदि इस दिशा में थोड़ा भी काम हुआ होता और उस काम से जो भी सूत्र निकल कर आते, यदि उनका खुले मन से अनुसरण किया गया होता, तो हमारी बहुसंख्यक समस्याएँ सुलझ गईं होतीं। सबसे पहला प्रश्न यह उठता है कि किसे प्राकृत माना जाए और किसे प्राकृत साहित्य तथा उसके साथ किस काल-खण्ड की प्राकृत की रचना-धर्मिता को जोड़कर देखा जाए और उसके आधार पर पूरी साहित्य-परंपरा को आँकने का प्रयत्न किया जाए। क्या केवल शिलालेखों की प्राकृत को प्राकृत मान लिया जाए या केवल धर्म-दर्शन के ग्रन्थों की प्राकृत को प्राकृत, या-फिर मात्र सृजनात्मक ग्रन्थों की प्राकृत को प्राकृत या प्राकृत के जितने भी रूप हैं, उन सब की प्राकृत को प्राकृत और उन सब में जो साहित्य अंश है, उस साहित्यिक अंश को समाहित करते हुए सब प्रकार की प्राकृत को प्राकृत, फिर एक बात और है कि प्राकृत साहित्य की परम्परा को कैसे देखा जाए?.....
ध्यान से देखें तो सारे भारत वर्ष में प्राकृत रूप फैले हुए हैं, पर दिक्कत यह है कि हम उन रूपों को प्राकृत रूपों की तरह जानते नहीं हैं।
इस संगोष्ठी का मूल उद्देश्य चन्द्रगिरि के शिलालेखों की पड़ताल के साथ-साथ प्राकृत की विविधताओं में संरक्षित प्राकृत की सम्पदा का आलोडन करते हुए उसके भाषायी विकल्पों, साहित्यिक विकल्पों, सामाजिक विकल्पों व सांस्कृतिक विकल्पों आदि को तलाशने में निहित होना चाहिए, जिससे कि भारत की अखंड भारतीयता रची गई है। हम इस संगोष्ठी के माध्यम से जहाँ प्राकृत के भाषायी विकल्पों को लेकर भाषावैज्ञानिकों के बीच में आगे चलकर संवाद कराना चाहते हैं, वहीं प्राकृत के साहित्य-विशेषज्ञों के बीच में भी प्राकृत के साहित्यिक प्रतिरूपों को लेकर आधुनिक साहित्यिक प्रतिरूपों के साथ सामंजस्य बैठाते हुए बहस भी चलाना चाहते हैं; हम जहाँ एक ओर इतिहासकारों को भी भारत के इतिहास को प्राकृत-रूपों के साथ सँजोकर नई दिशा देने के लिए आमंत्रित करना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर संस्कृति-विशेषज्ञों को भी यह देखने के लिए प्रेरित करना चाहते हैं कि भारतीय संस्कृति का नैरंतर्य प्राकृत को अनदेखा कर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। प्राकृत की कलाएँ और प्राकृत का जीवन भी हमारी आज की कलाओं और जीवन का उत्स रहा है, अतः उसे भी जोड़कर हम इस गोष्ठी में चर्चा चाहते हैं। प्राकृत की धर्म-दर्शन और अध्यात्म की संपदा को भूलकर यदि हम भारत के आध्यात्मिक क्षितिज को देखेंगे, तो वह अधूरा दिखेगा।
शिलालेख और साहित्य केवल इतिहास की सूचना ही नहीं देते अर्थात् वे ऐतिहासिक तथ्य प्रस्तुत करने वाले दस्तावेज-भर ही नहीं होते, बल्कि वे जिस काल-खण्ड में रचे जाते हैं, उस काल-खण्ड की सृजनात्मकता व सामाजिक संकेत के प्रतीक भी होते हैं। चन्द्रगिरि के शिलालेखों पर आप दृष्टि डालें, तो निम्न बातें प्रमुख रूप से उभर कर आती हैं-
1. चन्द्रगिरि के श्री पाश्र्वनाथ वसदि के दक्षिण की ओर के पहले शिलालेख की निम्न दो विशेषताएँ प्रमुख रूपेण उल्लेखनीय हैं-
अ. यह शिलालेख संस्कृत भाषा में अनुबद्ध है, पर पहली पंक्ति ही इस बात को प्रमाणित करती है कि इसके लेखन में पाणिनि के व्याकरण का अनुपालन नहीं हुआ, क्योंकि पहली पंक्ति में दो पद हैं, एक ‘सिद्धम्’ और दूसरा ‘स्वस्ति’ पाणिनीय व्याकरण के तहत ‘नमः-स्वस्ति.....’ आदि के योग में चतुर्थी विभक्ति होनी चाहिए और तदनुसार सिद्धम् पाठ न होकर सिद्धाय पाठ होना चाहिए था, पर शिलालेख-कार को यह पाठ स्वीकार नहीं है। वह ‘सिद्धम् स्वस्ति’ कहता है, दूसरे सिद्धम् के मकार का प्रयोग शिलालेख-कार ने अनुस्वार के रूप में नहीं लिया, -ये दोनों बातें यह सिद्ध करती हैं कि शिलालेख लिखने और लिखाने वाले को पाणिनीय व्याकरण स्वीकार नहीं था, ऐसे में देखने की जरूरत यह है कि क्या स्वस्ति के योग में किसी व्याकरण में द्वितीया स्वीकार है, यदि है, तो वह कौन-सा व्याकरण है, या ऐसे कौन-कौन-से व्याकरण हैं, जो स्वस्ति के संयोग में द्वितीया को स्वीकारते हैं। हमें व्याकरण के सूत्र सहित सम्बन्धित व्याकरण के नाम के अनुसंधान की ओर बढ़ना चाहिए, ऐसे ही द्वितीया विभक्ति के मकार को अनुस्वार के रूप में क्यों नहीं लिया गया, -इसका उत्‍तर भी हमें विभिन्न व्याकरणों के संदर्भ से तलाशना चाहिए। यदि ये उत्‍तर हमें उपलब्ध व्याकरणों के सन्दर्भ से नहीं मिलते, तो हमें चन्द्रगिरि के शिलालेखों में प्रयुक्त संस्कृत का पृथक् से व्याकरण लिखने-लिखाने की ओर बढ़ना चाहिए एवं इस तलाश की ओर भी प्रयत्न करना चाहिए कि शिलालेखों में प्रयुक्त संस्कृत भाषा के नियम परवर्ती भाषा के साहित्य में कहाँ-कहाँ और मिलते हैं, और यदि हमें मिल जाएँ, तो उनसे उनका सम्बन्ध जोड़ने की तरफ भी विचार करना चाहिए और यदि ऐसे उल्लेख भी कहीं अन्यत्र नहीं मिलते, तो हमें दृढ़ता-पूर्वक यह सामने लाना चाहिए कि चन्द्रगिरि के शिलालेखों की संस्कृत की ये विशेषताएँ हैं, जो अभी तक व्याकरणों में समायी न जा सकीं।
ब. यह पहला शिलालेख लम्बी सामासिक पदावली वाला शिलालेख है। भाषा भी बड़ी उपसर्ग-बहुल विलक्षण पदावली वाली साहित्यिक प्रकृति की है। शिलालेख में लयात्मक छन्द भी हैं, और तथ्यात्मक सूचना देने वाले गद्यांश भी। प्रारंभ में चार श्लोक दिये हैं, और उसके बाद गद्य में जिन-धर्म का, जिन-पूजा का, विधान का, जिन-तीर्थ का, और जिन-शासन आदि का उल्लेख है। यहाँ ‘तिमिर’ के साथ ‘वि’ उपसर्ग का प्रयोग अपने में कुछ विशेष-सा है।
2. इन शिलालेखों में ऐसे अनेक प्रयोग भी हैं, जो बहुत विरल हैं। जैसे- पृष्ठ संख्या 148 पर उल्लिखित संस्कृत का ‘अचीकरत’ प्रयोग। इससे स्पष्ट है कि ये शिलालेख उस काल में भी होने वाले संस्कृत जैसी भाषा के विरल प्रयोगों को भी अपने भीतर संरक्षित किये हुए हैं।
3. शिलालेखों में प्रयुक्त शब्दों, पदों व अन्य संरचना-विशेषों की कन्नड को ध्याऩ में रखते हुए आधुनिक कन्नड़ व मराठी की विकास-यात्रा लिखी जानी चाहिए, मराठी की भी इसलिए, क्योंकि मराठी वाले भी यह मानते हैं कि मराठी के मूल का प्राचीनतम शिलालेख यहीं सुरक्षित है, जिससे यह भी प्रकाशित हो सकेगा कि इन भाषाओं की या इन भाषाओं के संसार की ऐसी कौन-कौन-सी आज परम्पराएँ हैं, जो मूल रूप में इन शिलालेखों के काल में भी रही थीं।
4. इन शिलालेखों में बहुत से छन्द ऐसे हैं, जो लय के विशेष प्रकारो के उत्कृष्ट नमूने हैं। लगता है कि ये लयें शिलालेख काल की लोक भाषा में रही होंगीं, जो शिलालेखों में उत्कीर्ण र्हुइं। चूँकि पूर्व-लोक-लयों में रही होंगी, और यदि इन लयों पर कभी उत्‍तर-काल में कोई आक्रमण न हुआ होगा, तो ये लयें आस-पास की लोक-लयों में या-तो सब या इनमें से कुछ जरूर आज भी जीवित बची होंगी, अतः जरूरत इस बात की है कि आस-पास के पूरे परिदृश्य के लोक-गीतों को सुनकर रिकॉर्ड किया जाए, संगृहीत किया जाए और जहाँ सामने दिखें, वहाँ से आज की कन्नड़ और मराठी के लोक संसार की विकास-यात्रा भी लिखी जाए।
5. चूँकि शिलालेखों का काल लगभग एक हजार साल है, अतः इनके भीतर भी विभिन्न प्रकार के बदलाव दिखेंगे, उन बदलावों को विश्लेषण के आधार पर रेखांकित किया जाना चाहिए, ये बदलाव शब्दों, संरचनाओं के नियमों अर्थात् व्याकरणिक इकाइयों व विविध अवधारणाओं के स्तर पर देखे जा सकते हैं।
6. अब ये तथ्य भी सामने आये हैं कि कन्नड़ का प्राचीनतम शिलालेख ईसा के बाद की चैथी शताब्दी यानि चार सौ ए. डी. का है और वह गुणभूषितान् निसद्धि शासन नामक चन्द्रगिरि पर उपलब्ध 271 शिलालेखों में से एक है, इसीलिए चन्दगिरि के शिलालेख और भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि कन्नड़ भाषा के प्राचीनतम शिलालेखीय रूप को ये आज भी सुरक्षित किये हुए हैं। डॉ. मंजूनाथ ने विभिन्न भाषाई व शिलालेखीय प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध किया है कि श्री पाश्र्वनाथ बसदि के नजदीक वाला ‘गुणभूषितान् निसद्धि शासन्’ शिलालेख ही कन्नड़ का प्राचीनतम शिलालेख है। उन्होंने यह भी स्थापना की है कि उक्त शिलालेख सातवाहन-ब्राह्मी एवं आदि-गंगा-लिपि में लिखा हुआ है। माननीय पं. ए. के. चिदानन्द-मूर्ति वरिष्ठ कन्नड़ विद्वान भी विभिन्न तथ्यों के माध्यम से यह कहते हैं कि ‘गुणभूषित निसदि’ शिलालेख कन्नड़ भाषा का है, पूर्वार्द्ध भले कन्नड़ लिपि में लिखा गया हो, पर उनकी मान्यता अनुसार यह पूरी संभावना भी है कि यह शिलालेख ‘हलमिदि शिलालेख’ से कम से कम पचास से सौ वर्ष पुराना जरूर है।
7. श्रवण-बेलगोल भगवत्-गोमटेश से जुडे़ हुए तथ्यों के कारण गोमटेश गाथा का केन्द्र माना जाता है, पर मुझे तो लगता है कि वह गोमटेश गाथा के साथ-साथ प्राकृत-संस्कृत और कन्नड़ की विचार-परम्परा की राजधानी भी है, क्योंकि तीनों की संबद्धता किसी न किसी रूप में श्रवण-वेलगोल से जरूर है। यह तथ्य भी महत्‍व का है कि चन्दगिरि के शिलालेखों में संस्कृत और कन्नड़ भाषाओं का प्रयोग हुआ, पर ऐसे शिलालेख कम हैं, जो केवल संस्कृत की परम्परा के उद्वाहक हों और ऐसे ही केवल कन्नड़ की परम्परा वाले भी। यहाँ कई शिलालेख ऐसे हैं, जिनमें संस्कत और कन्नड़ का अलग-अलग भी और दोनों के मिश्रित रूपों का प्रयोग भी है, इससे यह बात भी साफ है कि जिस काल में ये शिलालेख लिखे गये, उस काल का बुद्धि-जीवी दोनों भाषाओं में अच्छी गति, अच्छी दखल रखता था, वल्कि तथ्य यह भी है कि वह एक-दूसरी भाषा को परस्पर पूरक भी मानता था, इसीलिए अधिकांश लम्बे शिलालेखों में दोनो भाषाओं का प्रयोग एक-साथ मिलता है। चूँकि कन्नड़-लोक-भाषा रही है और आज भी है तथा ऐसे अनेक शोधकार्य हुए हैं, जिन्होंने प्राकृत से कन्नड़ की विकास-यात्रा को रेखांकित किया है, इसलिए प्राकृत के लोक-भाषाई तत्‍व की रक्षा की दृष्टि से कन्नड़ के शिलालेख, जो चन्द्रगिरि पर हैं, बडे़ महत्‍व के हैं, वल्कि उन्हें कहा तो यह भी जा सकता है कि वे शिलालेख प्राकृत के लोक-भाषाई रूप के विकास के शिलालेख हैं, कुछ शिलालेखों में जो छन्द आदि हैं या जो छन्द आदि में प्रयुक्त लय है, वह बहुत स्पष्ट रूप से लगती है कि प्राकृत लय है, लोक-लय है और यदि सांस्कृतिक दृष्टि से संपूर्ण कन्नड़ क्षेत्र की लोक-लयों का अध्ययन किया जाए, लोक-गीतों को सुना जाए, तो यह साफ दिखेगा कि यह इन शिलालेखों में संरक्षित लोक-लय की विकास-यात्रा का प्रतिफल है, पर इसके लिए निरंतर अनुसंधान वाली दीर्घकालिक परियोजना चलाये जाने की जरूरत है, पर इससे हमारे कन्नड़ समाज की आज की बहुत सारी समस्याओं का समाधान भी होगा।
8. इन शिलालेखों को पढ़ने से या इनके कन्नड़ अंश को पढ़ने से कई जगह ऐसा लगता है कि कन्नड़ शिलालेखों की पदावली भी संस्कृत-शैली की है, या संस्कृत शिलालेखों की पदावली कन्नड़-शैली की है, या दोनो में एक-जैसी पदावली है, जो उस काल की विशेषता थी और वह किसी एक मूल-उद्गम-रूप से विकसित हुई। मैं यद्यपि कन्नड़ नहीं जानता हूँ, पर इन शिलालेखों के साठ से सत्‍तर प्रतिशत अंश को मैं समझ सका हूँ, इसलिए मुझे लगता ही नहीं कि ये शिलालेख मेरी मूल परम्परा के शिलालेख नहीं हैं। दाक्षिणात्यों की दक्षिणी भाषा-भर के शिलालेख हैं, यदि ऐसा होता, तो मुझे बोध-गम्य भला कैसे होते या कैसे होने चाहिए थे?.... यह तो अँग्रेज बहादुरों के द्वारा सोची-समझी रणनीति के तहत फैलाई गई दाक्षिणात्यों और आर्यों को परस्पर विभेदक ठहराने की बात भर थी। चन्द्रगिरि शिलालेखों की यह परम्परा ऐसी प्रचारित भ्रान्त धारणाओं का मुँह-तोड़ जबाव देती है और इस प्रकार इनसे यह संकेत भी जाता है कि उत्‍तर और दक्षिण का भारत एक है, अलग-अलग नहीं।
9. चन्द्रगिरि के शिलालेख किसी एक काल-खण्ड में रचे गये शिलालेख नहीं हैं, वे अनेक कालों में रचे हुए शिलालेख हैं और उनमें अनेक ऐसे तथ्य व ऐसी नैक परम्पराएँ सुरक्षित हैं, जो भारतीयता के उस रूप को कहीं अन्यत्र से भी प्रकाशित करती नहीं मिलतीं।
10. शिलालेखों की कन्नड़ बहुत्र लगती है कि संस्कृत से प्रभावित है और बहुत्र प्राकृत से। कन्नड़ की छन्द संरचना भी ऐसा लगता है कि संस्कृत छंन्द की ही अनुगूँज कर रही है। कई-बार ऐसा भी लगता है कि दोनों के ही अर्थात् संस्कृत और कन्नड़ दोनों के छन्द जो शिलालेखों में उद्धृत हैं, वे किसी एक अन्य मूल से ही विकसित होकर आये हैं, कई शिलालेख ऐसे हैं, जिनमें संस्कृत और कन्नड़ दोनों प्रयोग एक-साथ हैं, इससे यह बात साफ है कि उस काल का बुद्धिजीवी दोनों भाषाओं में अच्छी गति रखता था, गति न भी रखता हो, तो भी कम से कम इन्हें समझता जरूर था।
11. चन्द्रगिरि के शिलालेख देव-गति, देह-त्याग, संन्यास-विधि के प्रसंगों से भरे पडे़ हैं, शिलालेख संख्या 1, 2, 4, 12,13,14,19,20, 23,26,27,28,29, 30,31,32,33, 34,35, 38, 41, 42,43,44, 46,47,48,49,51,52,53 में ये उल्लेख स्पष्ट रूप में मिलते हैं।
12. इन शिलालेखों में दान की प्रवृत्ति भी बडे़ स्पष्ट रूप में उल्लिखित हुई है। इस प्रवृत्ति के फल-स्वरूप निषद्या-मन्दिर-वसदि आदि के निर्माण का उल्लेख शिलालेख संख्या 24,25,38,40,41,42,43,44,46,47,48,51,52,62,64,65,66,67, में स्पष्ट रूप से मिलता है।
13 ‘‘श्रीमत्-परम-गंभीर...’’ का उद्घोष चन्द्रगिरि के शिलालेखों में लगभग 11 बार हुआ है।
14. इन शिलालेखों में केवल आचार्यों व साधुओं का उल्लेख ही नहीं है, बल्कि सामान्य-जनों, गृहस्थों के देह-त्याग का उल्लेख भी है, इससे यह बात भी साफ होती है कि उस काल में तीर्थ-स्थलों व समाधि के लिए उपयुक्त स्थलों पर जीवन के उत्‍तर-काल में शरीर-त्याग के लिए केवल साधु-साधक ही नहीं, बल्कि गृहस्थ-साधक भी जाते थे।
15. 49 वे शिलालेख में गृहस्थों के द्वारा करणीय चतुर्विध प्रकार के दान का बहुत सुन्दर वर्णन है। यथा-
आहारं त्रिजगज्जनाय विभयं भीताय दिव्यौषधं
व्याधिव्यापदुपेतदीनमुखिने श्रोत्रे च शास्त्रागमं।
एवं देवमतिस्सदैव ददती प्रप्रक्षये स्वायुषा-
मर्हद्देवमतिविधाय विधिना दिव्या वधू प्रोदभू।।4।।
आहारशास्त्राभयभेषजानां दायिन्यलंवण्र्णचतुष्टयाय।
पश्चात्समाधिक्रिययायुरन्ते स्वस्थानवत्स्वः प्रविवेशयोच्चैः।।7।।
16. कुछ शिलालेखों में जय-पराजय की चर्चा, रक्षक के द्वारा रक्षा करने की चर्चा, अभिषेक करने और कराने की चर्चा, विभिन्न पदवियों से विभूषित होने की चर्चा का बहुत सुन्दर उल्लेख है व देव-वन्दना करने का वर्णन भी 22 वे शिलालेख में है। एक जगह उल्लेख मिलता है कि अशन आदि को त्याग-कर पुनर्जन्म को (शिलालेख 17-18) साधक ने जीत लिया, तो दूसरी जगह उल्लेख है कि सिद्ध-लोक को प्राप्त कर लिया (सिद्धलोकं गतर्पुनः) (शिलालेख 15)। यह उल्लेख है कि पाप, अज्ञान, मिथ्यात्व को नष्ट कर काम और मद का दमन कर कटवप्र-पर्वत पर चरित्र श्री मुनिराज-मुनिव्रत-पालकर सुख को प्राप्त हुए (शिलालेख 3)। इन सब उल्लेखों से लगा है कि इस स्थान से सिद्धत्व की प्राप्ति की बात भी ये शिलालेख करते हैं।
17. शिलालेख 13 व 14 का उल्लेख बताता है कि ऋषभसेन गुरु के शिष्य नागसेन गुरु ने संन्यास-विधि से प्राणोत्सर्ग किया।
18. अभी तक जो अध्ययन हुए हैं, उनसे यह पता नहीं चलता कि जिस काल में शिलालेख लिखे गये, उस काल में शिलालेखों में उल्लिखित कौन-कौन-सा संज्ञा-पद कौन-कौन-सा विशेषण ले रहा है और वह किन-किन क्रिया-पदों को ले रहा है अथवा उनके साथ कौन-कौन-से क्रिया-पद प्रयुक्त हो रहे हैं, यदि इस दृष्टि से भी अध्ययन हुआ होता, तो शिलालेखों में प्रयुक्त भाषिक-पदों के आपसी साहचर्य का भी पता चलता। शिलालेख 16 मे ‘‘प्रगृहीत्वा’’ पद का प्रयोग मिलता है, जबकि पाणिनीय व्याकरण के अनुसार प्रगृहीत्वा के स्थान पर ‘‘प्रगृह्य’’ का प्रचलन अधिक है, इससे संकेत मिलता है कि शिलालेखों में पाणिनीय व्याकरण के अतिरिक्त किसी जैन परम्परा के व्याकरण का अनुपालन भी हुआ है, देखने की जरूरत यह है कि वह व्याकरण किन जैन आचार्य के द्वारा रचित है, जिसका कि चन्द्रगिरि के शिलालेखों में आश्रय लिया गया है।
19. इन शिलालेखों से यह भी पता चलता है कि हमारे आचार्यांे, यतिवरों, मुनिवरों की किस-किस प्रकार की विशेषताएँ थीं और वे किन-किन क्षेत्रों के विशेषज्ञ होते थे। कोई न्याय-विद्या का विशेषज्ञ होता था, तो कोई व्याकरण का, तो कोई साहित्य का आदि-आदि। बात इतनी ही नहीं इन मुनियांे, आचार्यों के सम्पर्क में आते ही भूत, प्रेत आदि की बाधाएँ भी अपने-आप दूर हो जाती थीं; एक जगह उल्लेख मिलता है कि व्रह्मराक्षस के स्मरण मात्र से महाग्रह भी अपना दुष्प्रभाव छोड़ देते थे। इसप्रकार स्पष्ट है कि हमारे उस काल के आचार्य, यतिवर अपनी अति-विशिष्ट पहचान वाली विशेषताओं से अलंकृत होते थे।
20. शिलालेख संख्या 73 और 74 के हिन्दी-अनुवाद से एक दूसरे के कथन का परस्पर खंडन होता-सा दिखता है, किंवदन्ती है कि मलयाल-नायक ने चन्द्रगिरि पर्वत से निशाना साधा और उन निशानों के आधार पर विन्ध्यगिरि पर्वत पर गोमटेश-बाहुबली भगवान् की प्रतिमा निर्मित हुई, शिलालेख 73-74 जो निम्न रूप में पठित है। यथा- ‘‘स्वस्ति-श्री-ईश्वर संवत्सरद मलयाल कोदयु-सङ्करनु इल्लिद्र्द एञ्च गद्देय हडुवण हुणिसेय मूरुगुण्डिगे।।73।।’’(इस स्थान पर खडे़ होकर ‘मलयाल कोदयु सङ्कर’ ने आर्द्र भूमि के पश्चिम की ओर इमली के वृक्ष के समीप की तीन शिलाओं पर बाण चलाये। लेख में संवत्सर का नाम ईश्वर दिया हुआ है।) तथा ‘‘स्वस्ति श्रीपराभवसंवत्सरद माग्र्गसिर बहुल अष्टमी सुक्रवारदन्दु मलेयाल अध्यादि-नायक हिरियबेट्टकेच्च।।74।।’’ (‘मलयाल अध्याडि नायक’ ने विन्ध्यगिरि से चन्द्रगिरि का निशाना लगाया। लेख में पराभव संवत्सर का उल्लेख है। शक 1168 पराभव संवत्सर था) का उल्लेख बताता है कि विन्ध्यगिरि-पर्वत से चन्द्रगिरि की ओर निशाना साधा अगर चन्द्रगिरि के 73वें और 74वें दोनों शिलालेखों के कथन को सत्य माना जाए, तो अनुसंधान यह किया जाना चाहिए कि 74 वे शिलालेख का उद्देश्य क्या था?...वह उद्देश्य किसी कथन से पोषित होकर प्रकाशन में क्यों नहीं आ पाया।
21. उपर्युक्त दोनों शिलालेखों में मलयाल-पद का उल्लेख है। क्या इस मलयाल-पद का सम्बन्ध कहीं मलयालम-भाषा से तो नहीं है, और यदि ऐसा है तो क्या इस प्रकार की संभावना की बात भी की जानी चाहिए कि जिस काल में ये शिलालेख लिखे गए, उस काल तक मलयालम और कन्नड़ का भेद स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हुआ था और इसीलिए कन्नड़ प्रान्त के अन्तर्गत लिखे जाने वाले शिलालेख के नायक का उल्लेख मलयाल-नायक के रूप में इन दोनों शिलालेखों में हुआ है।
22. जैन आचार्य-परम्परा एवं मुनि-परंम्परा का उल्लेख भी शिलालेख संख्या 39 से लेकर 47 तक के शिलालेखों में बहुत स्पष्ट है। 40 वे शिलालेख के 10 वे व 11 वे श्लोकों में किया गया पूज्यपाद-स्वामी का वर्णन बहुत सुन्दर है। यथा-
यो देवनन्दि प्रथमाभिधानो बुद्ध्या महत्या स जिनेन्द्रबुद्धिः।
श्री पूज्यपादोऽजनिदेवताभिय्र्यत्पूजितं पाद-युगं यदीयं।।40-10।।
जैनेन्द्रं निज-शब्द-भोगमतुलं सव्र्वार्थसिद्धिः परा
सिद्धान्ते निपुणत्वमुद्धकवितां जैनाभिषेकः स्वकः।
छन्दस्मूक्ष्मधियं समाधिशतक-स्वास्थ्यं यदीयं विदा
माख्यातीह स पूज्यपाद-मुनिपः पूज्यो मुनीनां गणैः।।40-11।।
23. शिलालेख संख्या (40) के (24) वे श्लोक में उल्लेख है कि श्रुतकीर्ति त्रैविद्य मुनिराज ने राघव-पाण्डवीय नामक चमत्कारी काव्य की रचना की, जो आदि से अन्त तक और अन्त से आदि तक अर्थात् दोनों ओर से पढ़ा जा सकता है।
24. इतना ही नहीं अन्य शिलालेखों में उद्धृत शब्दों का, छन्दों का वर्णन अपने-आप में बेजोड़ है। शब्द-गुम्फन इतना लय-पूर्ण, मधुर और सरल है, जिससे ऐसा लगता है कि उसे बार-बार पढ़ते रहें। निम्न उद्धरणों के काव्य सौन्दर्य को जरा देखिए-
जयतु दुरितदूरः क्षीरकुप्पारहारः
प्रथित-पृथुल-कीर्तिश् श्री-शुभेन्द्र-व्रतीशः।
गुणमणिगणसिन्धुश्शिष्टलोकैकबन्धुः
विबुधमधुपफुल्लः फुल्लबाणादिशल्लः।।46-1।।
कुमत-घन-समीरो ध्वस्तमायान्धकारो
निखिलमुनिविनूतो रागकोपादिघातः।।7।।
चित्‍तो शुभावनां जैनीं वाक्ये प्चनमस्क्रियां।
काये व्रतसमारोपं कुव्र्वन्नध्यात्मविन्मुनिः।।8।।
25. शिलालेख संख्या (42) के (36) वे श्लोक में किया गया माघनन्दि मुनि का वर्णन तो जरा देखिए, कितना अद्भुत व मुनिराज की विशेषताओं को अपने में समेटे हुए कितना सुन्दर है-
गाम्भीय्र्ये मकराकरो वितरणे कल्पदु्रमस्तेजसि
प्रोच्चण्ड-द्युमणिः कलास्वपि शशी धैय्र्ये पुनर्मन्दरः।
सव्र्वोव्र्वी-परिपूण्र्ण-निम्र्मल-यशो-लक्ष्मी-मनो-रञ्जनो
भात्यस्यां भुवि माघनन्दिमुनिपो भट्टारकाग्रेसरः।।42-36।।
26. ऐसे ही श्लोक संख्या (6) में श्री गृद्ध-पिच्छ-मुनिराज के शिष्य श्री बलाकपिच्छ का और (7) वे में उनके शिष्य गुण-नन्दि यति का बहुत ही आकर्षक वर्णन प्रस्तुत है, जिससे लगता है कि वे मुनिराज कितने मनोहारी रहे होंगे।
श्री गृद्धपिञ्च्छ-मुनिपस्य बलाकपिञ्च्छ-
शिष्योऽजनिष्ट भुवनत्रय-वर्ति-कीर्त्‍िाः।
चारित्रचुञ्चुरखिलावनिपालमौलि-
माला-शिलीमुख-विराजित-पाद-पùः।।42-6।।
तच्छिष्यो गुणनन्दिपण्डितयतिश्चारित्रचक्रेश्वर-
स्तक्र्क-व्याकरणादि-शास्त्र-निपुणस्साहित्य-विद्यापतिः।
मिथ्यावादिमदान्ध-सिन्धुर-घटासङ्घट्टकण्ठीरवो
भव्याम्भोज-दिवाकरो विजयतां कन्दप्र्प-दप्र्पापहः।।42-7।।
27. धार्मिक दान का जो लोग वैयक्तिक उपयोग करते हैं, उन्हें कितना साफ शब्दों में आगाह करते हैं शिलालेखकार, इसे निम्नांकित उदाहरण में देखा जा सकता है-
स्वदत्‍तां परदत्‍ता वा यो हरेद्वसुन्धरां
षष्टिव्र्वर्षसहस्त्राणि विष्ठायां जायते कृमिः।।59-16।।
28. आप शान्तला और गंगसेनापति की पत्नी लक्ष्मी का वर्णन निम्न 2 श्लोंकों में देखिए- कितना सटीक, साफ व स्वरूप-उद्घाटक है-
उक्तो वक्तª-गुणं दृशोस्तरलतां सद्विभ्रमं भ्रूयुगे
काठिण्यं कुचयोन्र्नितम्ब-फलके धत्सेऽतिमात्र-क्रमम्।
दोषानेव गुणीकरोषि सुभगे सौभाग्य-भाग्यं तव
व्यक्तं शान्तल देवि वक्तुमवनौ शक्नोति को वा कविः।।62-2।।
या सीता परिदेवताव्रतविधौ क्षान्तौ क्षितिय्र्या पुन-
य्र्या वाचा वचने जिनाच्र्चनविधौ या चेलिनी केवलम्
काय्र्ये नीतिवधू रणे जय-वधूय्र्या गङ्गसेनापतेः
सा लक्ष्मीव्र्वसतिं गुणैक-वसति-व्र्यातीततन्नूतनाम्।।63-2।।
29. मेरे दैहिक पितामह बाबू श्री कामता प्रसाद जी जैन ने चन्द्रगिरि के शिलालेखों के उद्धरणों के आधार पर राष्ट्रकूट, गंगवंश और विजयनगर आदि राजवंशों के इतिहास पर अपने संक्षिप्त जैन इतिहास के दूसरे खण्ड में प्रकाश डाला है, जिससे साफ होता है कि यदि चन्द्रगिरि के शिलालेख न होते, तो इन राजवंशों का जो इतिहास आज उपलब्ध हो रहा है, वह इतिहास भी उस रूप में उपलब्ध न होता। उन्होंने चन्द्रगिरि के 40 वे शिलालेख का विशेष प्रयोग करते हुए अपनी पुस्तक (सम जैन स्टोरिकल किंग एण्ड हीरोज) में भी शिलालेख संख्या 40 के निम्नांकित उद्धरण से यह बात साफ की है कि चन्द्रगुप्त, श्रुतकेवली भद्रवाहु-स्वामी के साक्षात् उत्‍तराधिकारी थे और उनकी कीर्ति चन्द्रमा के समान आह्लादकारी थी।
‘‘भद्रबाहु-श्रुतकेवलिनाथेषु चरमर्परमो मुनिः।
चंद्रप्रकाषोज्वलचंद्रकीर्त्‍िाः श्री चंद्रगुप्तोऽर्जनि तस्य षिष्यः।।’’
Tr. Shri Bhadrabahu was the last ShrutaKevali (knower of the entire of the Tirthankara’s Instruction Chandra gupta whose renown was more Inscription No. 40 at Shravanbelagola.
30. यदि शासन व मठ तथा प्राकृत शोध-संस्थान का सहयोग मिले, तो चन्द्रगिरि के शिलालेखों के अनुवाद का कार्य लगभग एक वर्ष में किया जा सकता है, पर इसके लिए कन्नड़ के विशेषज्ञ, विद्वानों के साथ कम से कम दो युवा-विद्वानों की भी आवश्यकता होगी और प्रथम दृष्ट्या यह कार्य तीन स्तरों पर किया जाना चाहिए, पहले स्तर में, युवा विद्वानों को कन्नड़ के शिलालेखीय अंशों से कन्नड़ की विभक्ति व अन्य प्रकार के प्रत्ययों को कैसे अलग किया जाए, -यह बताया जा सकता है और उस आधार पर वे समस्त शिलालेखों से उन प्रत्ययों को अलग कर वरिष्ठ विद्वानों की सहायता से मूल शब्दों व पदों का निर्धारण द्वितीय स्तर पर कर सकते हैं, तीसरे स्तर पर पुनः इस दृष्टि से परीक्षण किया जा सकता है कि कोई अंश उस प्रक्रिया से छूटा तो नहीं रह गया है और यदि छूटा रह गया हो, तो उसे पूरा करने का यत्न अपेक्षित होगा, इसका सीधे मुझ-जैसे विद्यार्थी को लाभ यह होगा कि वे ऐसे अन्यत्र उपलब्ध कन्नड़ अंशों का अर्थ व अनुवाद करने में सक्षम हो सकेंगे, जिससे कन्नड़ भाषा का विस्तार भी होगा।
उपर्युक्त चर्चा के आधार पर मुझे लगता है कि इन शिलालेखों पर अभी निम्नांकित कार्य और किए जाने की जरूरत है-
1. शिलालेखों में प्रयुक्त शब्दों, पदों व अन्य संरचना-विशेषों को लेकर आधुनिक कन्नड़ व मराठी के विकास की यात्रा खोजी जानी चाहिए, लिखी जानी चाहिए।
2. प्राकृत के रूपों से कन्नड़ के रूपों के बीच रहने वाली/बसने वाली अंतर-यात्रा को भी समझने की कोशिश होनी चाहिए।
3. शिलालेखों के छन्दों में उद्धृत लयों को लेकर आज उपलब्ध लयों का मिलान किया जाना चाहिए तथा उनकी विकास यात्रा लिखी जानी चाहिए। इस प्रसंग में जरूरत इस बात है कि आस-पास के पूरे परिदृश्य के लोक-गीतों को सुनकर रिकॉर्ड किया जाए, संगृहीत किया जाए और जहाँ सामने दिखें, वहाँ से आज की कन्नड़ और मराठी के लोक संसार की विकास-यात्रा भी लिखी जाए।
4. कई शिलालेखों में ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि अमुक ने सल्लेखना धारण कर अन्नत-सुख प्राप्त किया। मिथ्यात्व को नष्ट कर मुनिव्रत धारण कर अन्नत सौख्य हासिल किया, सिद्ध-लोक गये, जिससे ऐसा लगता है कि यह स्थान मुनिराजों की केवल तप-स्थली, सल्लेखना या समाधि-मरण-स्थली-भर होकर नहीं रही, बल्कि कुछ भव्य-आत्माओं ने यहाँ से मोक्ष भी प्राप्त किया। इसलिए जरूरत इस अनुसंधान की है कि हम यह तलाश करें कि किन-किन मुनिराजों ने यहाँ से मोक्ष पद प्राप्त किया और किन-किन ने केवल समाधिमरण किया?
5. चन्द्रगिरि के शिलालेख किसी एक काल-खण्ड में रचे गये शिलालेख नहीं हैं, वे अनेक कालों में रचे हुए शिलालेख हैं और उनमें अनेक ऐसे तथ्य व ऐसी नैक परम्पराएँ सुरक्षित हैं, जो भारतीयता के उस रूप को कहीं अन्यत्र से भी प्रकाशित करती नहीं मिलतीं। इन शिलालेखों में प्रयुक्त कुल शब्द-सम्पदा की सूची बनायी जाए और यह भी देखा जाए कि कितने शब्द उन्हीं अर्थों में आज की कन्नड़ में प्रयुक्त हो रहे हैं और किन के अर्थ बदल गये हैं, जिनके अर्थ बदले हैं, वे कैसे बदले हैं?...-यह पड़ताल भी की जानी चाहिए।
6. इन शिलालेखों में जिस तरह के व्याकरण का प्रयोग हुआ है, उस व्याकरण की बात अब तक कहीं नहीं हुई है और वह व्याकरण एकदम सामान्य भाषा जैसा व्याकरण नहीं है। इसलिए जरूरत इस बात की है कि श्रवणबेलगोल के शिलालेखों के व्याकरण पर एक महत्‍वपूर्ण काम हो। शिलालेखों में पाणिनीय व्याकरण के अतिरिक्त किसी और जैन परम्परा के व्याकरण का अनुपालन भी हुआ है। देखने की जरूरत यह है कि वह व्याकरण किन जैन आचार्य के द्वारा रचित है, जिसका कि चन्द्रगिरि के शिलालेखों में आश्रय लिया गया है।
7. शिलालेखों में प्रयुक्त शब्दों, पदों व अन्य संरचनाओं विशेषों की कन्नड को ध्याऩ में रखते हुए आधुनिक कन्नड़ व मराठी की विकास-यात्रा लिखी जानी चाहिए, मराठी की भी इसलिए, क्योंकि मराठी वाले भी यह मानते हैं कि मराठी के मूल का प्राचीनतम शिलालेख यहीं सुरक्षित है, जिससे यह भी प्रकाशित हो सकेगा कि इन भाषाओं की या इन भाषाओं के संसार की ऐसी कौन-कौन-सी आज परम्पराएँ हैं, जो मूल रूप में इन शिलालेखों के काल में भी रही थीं।
8. इन शिलालेखों को केन्द्र में रखकर न तो इनमें उल्लिखित भाषा की पूर्व परम्परा के साथ विकास की और न उत्‍तरवर्ती भाषिक-परम्परा के विकास की बात अब तक कहीं हुई है।
9. मुझे लगता है कि यह की जानी बहुत आवश्यक है। सबसे पहले जरूरत इस बात की है कि इन शिलालेखों के हम शब्द-दर-शब्द, पद-दर-पद, पंक्ति-दर-पंक्ति, हिन्दी और अँगे्रजी में अनुवाद प्रस्तुत करें, जिससे कि चन्द्रगिरि का सम्पूर्ण शिलालेखीय-संसार आज के बौद्धिक समाज के सामने लाया जा सके और यह काम उच्च-प्राथमिकता पर किया जाना चाहिए।
10. शिलालेखों में जितना अंश भी पठनीय है, उतने अंश के शब्दों का एक शब्द-कोश बनाया जाना चाहिए, ताकि चन्द्रगिरि के समस्त शिलालेखों की शब्द-संम्पदा पूरी तरह अर्थ-सहित आज के समाज के सम्मुख आ सके।
11. शिलालेख 58 यद्यपि पूरा नहीं पढ़ा जा सका है, इसका लेख बहुत घिसा हुआ-सा भी है, पर इसमें ‘‘गंधहस्ति’’ शब्द का उल्लेख एक-दो बार नहीं, बल्कि तीन-तीन बार मिलता है। संभव है कि इस गन्धहस्ति का सम्बन्ध कहीं उस गन्धहस्ति महा-भाष्य से तो नहीं था, जो आज उपलब्ध नहीं है, यदि था, तो वह किस रूप में था? -यह खोजे जाने की जरूरत है।
अब गोष्ठी के शीर्षक के उत्‍तर-पद प्राकृत-साहित्य-परम्परा पर आता हूँ। प्राकृतें भारतवर्ष की अनमोल धरोहर हैं। अनमोल इसलिए कि प्राकृतों के बिना भारत की संस्कृति का, भारत के इतिहास का, भारत की परम्परा का, भारत के साहित्य का, भारत की भाषाओं का सम्यक् लेखा-जोखा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और न इन्हें सम्यक् रूप से समझा ही जा सकता है, पर इन प्राकृतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये प्राकृतें ‘‘प्राकृत’’ कहलाये जाने के बावजूद भी भारत की विविधताओं की प्रकृति को अपने में सँजोये हुए हैं। विविधताओं के बिना प्राकृत की कल्पना करना कठिन ही नहीं, बल्कि असंभव-सा है या यूँ कहें कि बेमानी है। प्राकृत की ये विविधताएँ जहाँ भाषिक रूप में मिलती हैं, वहीं साहित्यिक रूप में भी और इसके साथ ही साथ सांस्कृतिक रूप में भी। सबसे बड़ी बात यह है कि प्राकृत की इन विविधताओं के माध्यम से भारत के बहु-भाषिक रूपों का अगर कहीं अखंड दर्शन होता है, तो वह दर्शन प्राकृतों के बिना संभव नहीं है। भाव यह है कि सभी भारतीय भाषाओं का संबंध प्राकृतों से किसी न किसी रूप में जरूर रहा है। आप प्राकृत के प्रयोगों को देखिये, तो शब्द-रूपों के जितने प्रकार प्राकृत में मिलते हैं, शायद किसी भी क्लासिकल-भाषा के भीतर शब्द-रूपों के उतने प्रकार नहीं मिलते हैं और ये प्रकार जहाँ अलग-अलग प्राकृतों में मिलते हैं, वहीं एक-एक प्राकृत के भीतर भी मिलते हैं। प्रतीकों के प्रयोगों को आप उठाकर देख लेवें, प्राकृत प्रयोगों के जितने सरल और सहज प्रतीक विविधताओं को लिये हुए प्राकृतों में हैं, उतने शायद अन्यत्र कहीं नहीं हैं, पर हमने इन प्रतीकों को अभी तक कहीं किसी एक कृति में सँजोया नहीं है ।
प्राकृत या प्राकृत के नाम से जानी जाने वाली जबानों या उप-भाषाओं के अभी तक जो अध्ययन हुए हैं, उनमें से अधिकांश ध्वन्यात्मक हैं या ध्वन्यांतरणात्मक या-फिर रूपात्मक। प्राकृत की या उसकी जबानों या उपभाषाओं की समग्रता को व उसकी/उनकी वाक्यात्मकता को ध्यान में रखकर या तो अध्ययन हुए नहीं, या-फिर यदि कोई हुआ भी हो, तो वह वैसी पहचान न बना सका। इस प्रस्तोता ने इस तथ्य की चर्चा लगभग पन्द्रह वर्ष पहले अपने शौरसेनी के कुछ भाषामूलक पक्ष वाले आलेख में कुंदकुंद भारती, नई दिल्ली में आयोजित एक संगोष्ठी में की थी, लेकिन फिर भी इस दिशा में कोई बहुत काम आगे नहीं बढ़ सके हैं या कोई पहचान वाली सार्थक पहल न हो सकी है। बात इतनी ही नहीं, हमने विभिन्न प्राकृतों की प्रयोग-राशि को इकट्ठा कर कोई एक ऐसा संग्रह भी अभी तक प्रकाशित नहीं किया, जिसमें सभी प्राकृतों की कुल प्रयोग-राशि एक-साथ मिल जाए और जब वह एक-साथ उपलब्ध नहीं, तो फिर उस पर भाषायी दृष्टि से या वाक्यात्मक दृष्टि से काम होने या करने की बात कैसे की जा सकती है? .......
आप इस विखरी हुई प्राकृत-संपदा को देखें, तो वह आपको निम्नांकित चार रूपों में प्रमुख रूप से मिलती है-
1. प्राकृत व संस्कृत के साहित्य और साहित्यशास्त्र के ग्रंथों में निबद्ध प्राकृत
2. षिलालेखों में उत्कीर्ण प्राकृत
3. वैदिक साहित्य में उद्धृत प्राकृत
4. बृहत्तर भारत की आधुनिक भाषाओं में सुरक्षित प्राकृत, आदि।
अभी तक प्राकृतों को लेकर ध्वन्यात्मक या ध्वन्यांतरणात्मक या रूपात्मक स्तर के भी जो काम हुए हैं या जो काम प्रकाश में आए हैं, वे भी ऊपर के पहले दो बिंदुओं तक ही सीमित हैं, बाद के दोनों बिंदुओं को लेकर वैसे काम भी लगभग नहीं हुए हैं।
पहले बिंदुओं को लेकर भी जो काम हुए, उनमें भी अधिकांश में प्राकृत के सभी नमूनों को ध्यान में रखकर बात लगभग नहीं की गई। कुछ ने हायब्रिड संस्कृत के नाम से विस्तीर्ण प्राकृत को अपने अध्ययन का विषय बनाया, तो कुछ ने पालि के रूप में पल्लवित प्राकृत को; वहीं कुछ ने अर्धमागधी के रूप में जैन श्वेतांबर संप्रदाय के आगम ग्रंथों की प्राकृत को, तो कुछ ने जैन शौरसेनी नाम की प्राकृत को; तो कुछ ने कुछ नाटकों व गं्रथों की प्राकृत को, आदि-आदि। बात इतनी ही नहीं, प्राकृत व्याकरणों के जो शास्त्र रचे गए, वे भी संस्कृत की आँख से रचे गए। प्राकृतों की संपदा को लेकर उसका विष्लेषण करते हुए केवल उनकी विशेषताओं को बताने वाले व्याकरण भी नहीं रचे गए और उनमें नियम भी ऊपर के चारों बिंदुओं को समाहित करने वाली संपदा को ध्यान में रखकर नहीं बनाये गए हैं।
प्राकृत या प्राकृतों को लेकर चार तरह की चर्चाएँ और मिलती हैं-
1. संस्कृत से प्राकृतें विकसित हुईं और उनसे आधुनिक भारतीय आर्य भाषाएँ;
2. जो ऊपर कहे गए मत को नहीं मानते और कहते हैं कि प्राकृतांे का संस्कारित रूप संस्कृत है, जैसाकि इन दोनों के नाम से भी संकेतित होता है, न कि संस्कृत का विकसित रूप प्राकृत या प्राकृतें;
3. प्राकृतें जनभाषाएँ थीं तथा उनमें निबद्ध सामग्री जनभाषाओं के जनभाषिक रूप को प्रस्तुत करती है;
4. कुछ लोग प्राकृत भाषाओं के साहित्य को जैनों का साम्प्रदायिक साहित्य या अपभ्रष्ट साहित्य या अमानक साहित्य (Sub-Standard) या अ-स्तरीय अराजक लोगों के साहित्य (Literature of vulgars) के रूप में भी प्रख्यापित करते हैं। ऊपर उद्धृत पहली मान्यता के पोषक ‘विभाजित कर शासन करने वाली’ नीति के पोषक कुछ अँगे्रज बहादुर व उनकी उद्घोषणा में अपने को प्राचीन सिद्ध करने की मानसिकता रखने वाले कुछ तथाकथित भारतीय विद्वान रहे हैं, पर वे यह भूल गए कि जिस प्रकार आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं के प्रारंभिक रूपों का विकास सीधे प्राकृत रूपों से दिखता है, ठीक वैसे ही दक्षिण की तेलुगू व कन्नड़ आदि भाषाओं के प्रारंभिक रूपों का विकास भी तो सीधे प्राकृत रूपों से दिखता है और जब प्राकृृतों का रिष्ता केवल भारतीय आर्य भाषाओं-भर से है, तो फिर दक्षिण की तेलुगू व कन्नड़ आदि भाषाओं के प्रारंभिक रूपों का विकास इन प्राकृतों से आखिर कैसे दिखता है, इतना ही नहीं, अफगानिस्तान की डारी आदि भाषाओं के प्रारंभिक रूपों का विकास भी अब गांधारी प्राकृत रूपों में दिखता सिद्ध हो रहा है, अतः प्राकृतों का संबंध केवल आधुनिक भारतीय आर्य भाषाओं तक सीमित करना ठीक नहीं, बल्कि तथ्य तो यह है कि ये प्राक्ृतें उस बृहत्तर भारत का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो कश्मीर से लेकर गाँधार तक फैला था। इस पहली मान्यता के पोषक कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो साहित्यिक प्राकृतों को भी लौकिक संस्कृत की तरह संस्कारित कहकर इनके जनभाषिक रूप को नकार देते हैं, पर वे भी यह भूल जाते हैं कि सट्टक-नाटकों को जनसामान्य के लिए ग्राह्य बनाने के लिए ही भले इन प्राकृत रूपों को गढ़ा गया हो, तो भी, है तो इनके केंद्र में भी जनभाषिकता और जनसामान्य ही न। इसलिए आज उपलब्ध साहित्यिक प्राकृतें भी प्राकृत जनभाषाओं के जनभाषिक रूप को ही प्रस्तुत करती हैं, न कि संस्कारित लोगों-भर के लिए रचे गए रूप-भर को।
ऊपर उद्धृत चैथी मान्यता के पोषक या तो अँगे्रज बहादुर हैं या फिर संस्कृत को सभ्यों या कुछ सांस्कारिक लोगों-भर की भाषा सिद्ध करने की मानसिकता रखने वाले कुछ तथाकथित भारतीय विद्वान ही हैं, पर वे यह भूल जाते हैं कि हमने अभी ऊपर जिस चार प्रकार की प्राकृत-संपदा की बात की, वह प्राकृत-संपदा केवल धार्मिक साहित्य-भर से जुुड़ी नहीं है, वह तो प्राकृृत के सर्वविध या बहुविध रूपों को रखने वाली संपदा है और उसमें केवल धर्मोपदेश निबद्ध हो,- ऐसा नहीं है। हाँ, यह तथ्य जरूर है कि उसका एक बड़ा भाग जैनधर्मानुयायियों के द्वारा पोषित व पल्लवित है, पर केवल जैनधर्म का वहाँ साहित्य हो, -यह तथ्य नहीं है। प्राकृत का एक रूप हायब्रिड संस्कृत के नाम से या फिर पालि के रूप में विस्तीर्ण सामग्री को सामने रखता है, जिसका संबंध बौद्धों के साहित्य से तो है, पर जैनों से नहीं और जो साहित्य एक आम नागरिक की भावनाओं को छूने वाला हो, जिसके बारे में यह भी पता न हो कि उसका रचने वाला कौन है, उसे किसी सम्प्रदाय या धर्म की भावना से जोड़कर कैसे साम्प्रदायिक कह दिया जाए?..........
अब इस चैथी मान्यता के दूसरे पक्ष पर आते हैं, जिसके अनुसार प्राकृतों के साहित्य को अपभ्रष्ट साहित्य या अमानक साहित्य (Sub-Standard) या अ-स्तरीय अराजक लोगों के साहित्य (Literature of vulgars) के रूप में प्रख्यापित किया जाता है, इस पक्ष के मानने वाले लोग भी यह भूल जाते हैं कि भाषाओं के मानकों को तोड़े जाने की प्रक्रिया भाषा के भीतर चलने वाली एक ऐसी सहज प्रक्रिया है, जो जीवंत भाषाओं में प्रकट-अप्रकट रूप में निरंतर चलती रहती है और ऐसा होना भाषाओं की सहज प्रवृत्ति का परिचायक है, उनके पथभ्रष्ट या अपभ्रष्ट होने जैसी अपमान-जनक स्थिति का बोधक नहीं। बात इतनी ही नहीं, प्राकृतों का साहित्य यदि अमानक (Sub-Standard) या अ-स्तरीय अराजक लोगों (Vulgars) का रचा साहित्य-भर होता, तो संस्कृत और प्राकृत के साहित्यशास्त्रियों के द्वारा काव्य के मापकों के पैमाने के उदाहरण के रूप में यह कैसे प्रस्तुत किया गया होता?........ जिसकी कि एक लंबी श्रृंखला मिलती है। भाव यह है कि प्राकृत साहित्य को उदाहरण के रूप में पेष किये जाने का उदाहरण किसी केवल एक काव्यशास्त्री का हो, -यह तथ्य भी नहीं है, बल्कि बात उल्टी है कि अनेक काव्यशास्त्रियों ने अपने मापकों के लक्षणों को स्पष्ट करने के लिए उदाहरण-प्रत्युदाहरण संस्कृत से न देकर प्राकृतों से दिये हैं। यह इस बात का सूचक है कि प्राकृतों का यह साहित्य कसौटी-रूप उत्कृष्ट मापकों का प्रस्तोता है।
भारतीय कविता के बहुविध रूपों में प्राकृत कविता के नाम से जानी जाने वाली पाली, प्राकृत और अपभ्रंश की कविता यद्यपि आज के पाठक के सम्मुख उस रूप में नहीं आयी है, जिस रूप में भारतीय कविता के अन्य रूप सामने आये हैं, पर यह कविता इसलिए महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह काल-निरपेक्ष मनुष्य की जीवन्तता के बहुविध रूपों को अपने में समेटे हुए है और प्राकृत कविता के ये काल-निरपेक्ष मनुष्य की जीवन्तता के बहुविध रूप इतने सबल, सहज और आज के संदर्भ में भी प्रासांगिक हैं कि वैसे रूप अन्यत्र देखने को नहीं मिलते, हम इनके कुछ नमूने इस आलेख के साथ/अंत में संलग्न कर रहे हैं। आप इन्हें देखेंगे, तो आपको लगेगा कि विश्व-कविता की दृष्टि से ये भारतीय कविता की अद्भुत धरोहर हैं।
वर्तमान संकट यह है कि वर्षों पहले संस्कृत काव्य-धारा तो श्री राहुल जी ने गद्यानुवाद के साथ प्रकाशित की, पर राहुल जी की आकांक्षा के बाद भी पाली, प्राकृत और अपभ्रंश की कविता की यह सतत धारा अब तक प्रकाशित न हो पायी, जिसके कारण अब तक प्राकृत कविता की काल-निरपेक्ष मनुष्य की जीवन्तता के इसप्रकार के बहुविध रूप आज की कविता के रसिक पाठक के सामने सम्यक् रूप से नहीं आ पाये और आज की पीढ़ी लगभग भारत की कविता की इस समृद्ध परंपरा से वंचित रह गई। इसके पीछे मूल कारण ये रहे हैं-
1. प्राकृत के या प्राकृत कविता के मूल पाठ के साक्षात् जानकार ही अब विरल हैं, अतः लाने वालों की विरलता के कारण और जो हैं भी उनका इस ओर झुकाव न होने के कारण ये रचनाएँ सामने न आ पायीं;
2. पाली, प्राकृत और अपभ्रंश की कविता के रूप में रची गई। ये प्राकृत कविताएँ इतनी विखरी पड़ी हैं कि उन्हें कविता के महत्व की दृष्टि से देखते हुए एक जगह सँजोकर लाना असंभव नहीं तो कष्ट-साध्य जरूर है;
3. आज की कविता की भाषा में उनका अनुवाद और-भी कठिन है, आदि-आदि। इससे सबसे बड़ी क्षति यह हुई है कि भारतीय कविता की इस समृद्ध परंपरा से आज के पाठक लगभग अनविज्ञ-से हैं, पर यह काम हम करना चाहते हैं।
इस काम को करने के लिए प्रमुख रूप से हमें निम्नांकित चरणों से गुजरना होगा- 1. प्राकृत कविता के रूप में विखरी पड़ी पाली, प्राकृत और अपभ्रंश की विस्तीर्ण काव्य-धारा का आलोडन कर ऐसी कविताओं का संचयन करना, जो काल-निरपेक्ष मनुष्य की जीवन्तता के बहुविध रूपों को अपने में समाने वाले अद्भुत नमूने हैं; 2. संचयन के समानांतर मूलानुगामी अनुवाद करते चलना; और फिर 3. उस मूलानुगामी अनुवाद को आज की ग्राह्य/स्वीकार्य कविता के मुहावरे में अनुकूलन करते चलकर अंतिम प्रेसकॉपी तैयार करना, आदि-आदि। इसप्रकार हम प्रतिवर्ष 150 से 200 कविताओं को अंतिम रूप में अनूदित कर प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।
साहित्यिक दृष्टि से आप प्राकृत संदर्भों को देखें, जिनको देखने पर आपको साफ लगेगा कि प्राकृत काव्य-साहित्य-संसार में ऐसे-ऐसे अनेक संदर्भ भरे पडे हैं, जो विष्व-काव्य-विद्या की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हैं, पर परेशानी की बात यह है कि हमने विश्व-काव्य-विद्या की दृष्टि से इन पर चर्चा कर इसके ऐसे अवसर उपस्थित नहीं किये, जिन पर चर्चा किया जाना अनिवार्य था। वज्जालग्गं की यह कविता देखिए, कैसी अनूठी है इसकी गूँज, कितना गहरा है इसका व्यंग्य-
अत्‍ता बहिरंधलिया बहुविहवीवाहसंकुलो गामो।
मज्झ पई य विएसे को तुज्झ वसेरयं देइ।।
अम्मा
बहरी-अंधी,
गाँव
विवाह के बहुविध कार्यक्रमों में व्यस्त
और
मेरा पति भी
परदेश में,
.............तब फिर
पथिक !
तुम्हीं बताओ
तुम्हें कौन दे
रैनबसेरा?
गाथासप्तशती की निम्न रचना को देखिए- कितना तीखा और अद्भुत प्रहार है दिनकर-दिनपति और परगामी स्वैर पर एक-साथ-
पच्चूसागअ र्जितदेह पिआलोअ लोअणाणन्द।
अण्णत्त खविअसव्वरि णहभूसण दिणवइ णमो दे।।
प्रत्यूषागत
राग रँगीले
तनु वाले हो
प्रियालोक तुम
नयनानंद बढ़ाने वाले
पता नहीं - तुम कहाँ बिताते
निशि प्रति-दिन हो?
हो नभ-भूषण या नख-भूषण?
हो दिनकर-दिनपति
या दिन-भर के पति तुम?
बोलो, तुम हो कौन-
हो नभ-भूषण या नख-भूषण
हो दिनकर-दिनपति
या दिन-भर के पति तुम?
नमन तुम्हें है,
नमन तुम्हें........
दसवैकालिक की एक कविता देखिए, कितनी साफ और कितना भारी व्यंय, लेकिन फिर-भी इस काल में हम पूज्य बनने से नहीं चूकते-
अलोलुए अक्कुहए अमाई अपिसुणे यावि अदीणवित्ती।
नो भावए नो वि य भावियप्पा अकोउहल्ले य सया स पुज्जो।।
रसलोलुप जो नहीं,
जादू-टोना भी जो जानता नहीं,
और
मायावी
चुगलखोर
दीन-हीन वृत्ति वाला भी
जो नहीं,
जो न तो अपनी प्रशंसा करता है
और न सुनता है,
कौतूहल स्वभाव वाला भी जो नहीं,
है वही पूज्य
पर
इस संसार में
ऐसा साधु है कहाँ?
रयणसार की एक कविता देखिए-
अदिसोहण-जोगेणं, सुद्धं हेमं हवेदि जह तह य।
कालादी-लद्धीए, अप्पा परमप्पओ हवदि।।
जैसे
अत्यधिक शोधन करने से
या खूब तपाने से
शुद्ध हो जाता
सोना,
बस,
वैसे ही
काललब्धि के द्वारा
अपने ही श्रम से
बनता
आत्मा
परमात्मा।
परम सत्य को उद्घाटित करने वाली ऐसी कविताएँ प्राकृत साहित्य में भरी पड़ी हैं, पर दिक्कत यह है कि हमने आज के बौद्धिक जगत् के सामने उन्हें समझ में आने वाली भाषा में रखा नहीं है, अगर यह काम हो जाए, तो निष्चय मानिए कि विष्व-साहित्य में हमारी ऐसी पहचान होगी कि जिस पर सही मायने में हमें गर्व होना चाहिए। वाग्भट्टालंकार की एक छोटी-सी कविता पढ़िए-
इच्छंति जे ण कित्तिं कुणंति करुणं खणं णि जे णेव्व।
ते धणजक्ख व्व णरा दिंति घणं मरण-समए वि।।
चाह नहीं जिन्हें
यश की,
नहीं उपजती
दुःखियों को देखकर भी
क्षण-भर के लिए भी
जिनके मन में करुणा
क्यों
नहीं लगता तुम्हें
कि
वे
केवल उस धन-यक्ष की तरह हैं
जो
नहीं छोड़ सकते
धन को
मृत्यु के समय भी
या
जो नहीं बाँट सकते धन
मरणशय्या पर होने पर भी......!
अलंकारसर्वस्व का निम्न उद्धरण देखिए-
इण्हिं पहुणो पहुणो पहुत्तणं किं चिरंतण-पहूण।
गुणदोसा दोसगुणा एहिँ कआ णहु कआ तेहिं।।
आजकल के प्रभु
निश्चय ही प्रभु हैं
पहले के प्रभुओं से भी
बढ़कर प्रभु हैं!
क्योंकि
जब ये चाहें तो
गुणों को
दोषों के रूप में
प्रतिष्ठापित कर दें,
और......
ऐसे ही
दोषों को
गुणों के रूप में
जरा पूछिए अपने-आप से-
क्या पहले के प्रभुओं ने
आम तौर पर
कभी ऐसा किया था?
.................
इसीलिए आज-कल के प्रभु
पहले के प्रभुओं से भी
बढ़कर प्रभु हैं!
मुनि श्री रामसिंह के पाहुडदोहा की एक कविता देखिए, आप कैसे इसे कह देंगे कि यह आज की विश्वकविता से किन्हीं माइनों में कम-तर है। यथा-
हलि सहि काइं करइ सो दप्पणु।
जहिं पड़बिंब न दीसइ अप्पणु।।
धंधुवाल मो जगु पड़िहासइ।
घरि अच्छंतु ण घरवइ दीसइ।।
अरे सखि!
क्या करें
उस दर्पण का
उस आइने का
जिसमें
दिखाई नहीं पड़ता
अपना ही प्रतिबिंब,
मुझे तो
सारा संसार
लगता है धंधेवाला,
क्योंकि इसमें
घर-वालों को ही
या घर में रहने वालों को ही
नहीं दिखता घरवाला!
प्राकृत वांगमय अद्भुत है, उसमें समाहित काव्य साहित्य अपनी अनूठी पहचान रखता है, पर दिक्कत यह है कि हमने अपने बहुतर साहित्य को उजागर न होने दिया और उसे वेष्टनों में बाँधकर तिजोरी में रखे रहे, इससे वह सुरक्षित तो रहा, पर विश्वसाहित्य में उसकी जो पहचान बननी चाहिए थी, वह न बनी या न बन सकी। हाँ, यह जरूर है कि कुछ कविताएँ व कुछ कथाएँ उजागर हो जाने के कारण उद्धृत जरूर हुईं, पर समूचे साहित्य के सम्मुख आने पर विश्वविद्या के क्षेत्र में जो उपस्थिति दर्ज होनी चाहिए थी, वह न हो सकी।
संस्थान के निदेशक महोदय ने जो पत्रक हमें भेजा, उस पत्रक में संगोष्ठी की संकल्पना के विषय में शीर्षक देने के अतिरिक्त कोई विशेष टिप्पणी नहीं की है और न ही उन्होंने चन्द्रगिरि के शिलालेखों तथा प्राकृत-साहित्य परम्परा पर, जिससे स्पष्ट है कि वे व आयोजक-गण संगोष्ठी के प्रतिभागियों को किसी निर्देश के साथ बाँधना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें पूरी तरह स्वतंत्र रहने देना चाहते हैं और चाहते हैं कि संगोष्ठी के शीर्षक एवं विषय पर गोष्ठी के प्रतिभागी-गण संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में खुलकर बिना किन्हीं प्रतिबंधों के साथ बात कर सकें और संगोष्ठी के शीर्षक से जुडे़ हुए विविध पक्षों को लाकर सामने रख सकें। मैं यह भी नहीं जानता कि संगोष्ठी के शीर्षक के निर्धारण में आयोजकों ने चन्द्रगिरि-शिलालेख-पद को ‘और’ योजक पद से पहले क्यों रखा और प्राकृत-साहित्य परम्परा को ‘और’ योजक के बाद में क्यों?... जो भी हो, इस क्रम में रखने से एक संकेत और जाता है कि शायद वे चन्द्रगिरि के शिलालेखों को प्राकृत-साहित्य-परम्परा से पहले का मानते हैं, इसीलिए उन्होंने चन्द्रगिरि-शिलालेख-पद को पहले रखा, पर ऐतिहासिक तथ्य इस पक्ष के समर्थन में नहीं हैं; इसलिए इस पक्ष को भी तथ्य-पूर्ण नहीं कहा जा सकता।
चन्द्रगिरि के शिलालेखों की भाषाओं पर विचार करें, तो वहाँ प्राकृत भाषा का कोई भी शिलालेख नहीं मिलता। वहाँ जो भी शिलालेख हैं, उनमें भाषा के रूप में संस्कृत का प्रयोग है और कन्नड़ का या और स्पष्ट नाम देना चाहें तो संस्कृतात्मक कन्नड़ का और उनमें भी संस्कृत का पहले, फिर कन्नड़। इस पूरी परिचर्चा से एक और प्रश्न उठता है कि क्या संगोष्ठी के आयोजक-गण संस्कृत को ऐतिहासिक क्रम में सबसे प्राचीन भाषा मानते हैं और फिर कन्नड़ को और फिर उसके भी बाद प्राकृत-साहित्य को। यदि ऐसा विचार है, तो संभवतः समुचित विचार नहीं है, इसलिए मुझे तो लगता है कि यदि संगोष्ठी का शीर्षक ‘‘प्राकृत-साहित्य-परम्परा और चन्द्रगिरि के षिलालेख’’ होता, तो शायद ज्यादा अच्छा होता। यह भी हो सकता है कि चूँकि लक्ष्य इस समय चन्द्रगिरि उत्सव मनाने का है, इसलिए चन्द्रगिरि शिलालेख पद को पहले रखा और फिर प्राकृत-साहित्य-परम्परा पद को। मैं यह भी नहीं जानता कि संगोष्ठी के आयोजक-गण चन्द्रगिरि के शिलालेखों के प्राकृत-साहित्य-परम्परा के साथ संबन्धों, देयों, तथा उपदेयों और ऐसे ही चन्द्रगिरि के शिलालेखों की रचना-धर्मिता के पीछे रहने वाले प्राकृत-साहित्य-परम्परा के देयों और उपदेयों पर चर्चा करना/कराना चाहते हैं, या संगोष्ठी के शीर्षक के योजक-पद ‘और’ के केवल पूर्ववर्ती पद और उत्‍तरवर्ती पद पर चर्चा कराना चाहते हैं; खैर, वे जो भी चाहते हैं, वह अपने वक्तव्य में वे कहेंगे ही और उसके अनुसार हम प्रतिभागी-गण कुछ चर्चा करेंगे ही या करने का प्रयत्न करेंगे ही।
एक विचार और हो सकता है कि गोष्ठी के आयोजक-गण यह मानते हैं कि चन्द्रगिरि के शिलालेखों में जो भाषाई संरचनाएँ हैं, वे प्राकृत भाषा-साहित्य की मूल परम्परा की उद्बाहिकाएँ हैं और इस प्रकार कन्नड़ आदि के जो प्रयोग हैं, वे प्राकृत की विकास-यात्रा के प्रति-फल हैं, पर अभी तक कोई ऐसे अध्ययन नहीं हुए या अभी तक कोई ऐसे अध्ययन सामने नहीं आए, जिनमें यह कहा गया होता कि प्राकृत के अमुक रूप से चन्द्रगिरि शिलालेख के अमुक रूप का ऐसा विकास हुआ। यहीं यह भी माना जा सकता है कि प्राचीन कन्नड़ के रूप जो चन्द्रगिरि के शिलालेखों में हैं, वे प्राकृत-साहित्य की परम्परा के मध्यकाल या उत्‍तरकाल के विकसित रूप हैं। चन्द्रगिरि पर उपलब्ध शिलालेख लगभग आठ-दस शताब्दियों की भाषा की, समाज की, साहित्य की, सृजनात्मकता की, धार्मिक जीवन आदि की कथा कहते हैं और इन शिलालेखों में निबद्ध तथ्य इतने सपाट, इतने साफ और इतने सरल व सहज हैं, जिनसे यह भी पता चलता है कि आठ-नौ सौ वर्षों के इस लम्बे काल-खण्ड में भी मानवीय जीवन की कितनी सरलता और सहजता थी व उसमें कितनी एक-सूत्रता भी थी। जो प्राचीनतम से लेकर सबसे उत्‍तरवर्ती शिलालेख तक यथावत् बनी रही। हमें एक-सूत्रता के उन बिन्दुओं को तलाशना चाहिए और देखना चाहिए कि क्या वे बिन्दु आज भी हमारे जीवन में रचे, पचे, बसे और बचे हैं?.... और यदि हैं, तो उनका पोषण और आगे कैसे किया जाए, पर यदि नहीं बचे हैं, तो उन्हें कैसे पुनरुज्जीवित किया जाए, -इस बिन्दु पर विचार किया जाना चाहिए।
कुलमिलाकर इस संगोष्ठी का चरम लक्ष्य चन्द्रगिरि के शिलालेखों की पड़ताल के साथ-साथ प्राकृत की विविधताओं यथा- भाषायी, साहित्यिक, सामाजिक, आध्यात्मिक व सांस्कृतिक में संरक्षित प्राकृत की सम्पदा का आलोडन-विलोडन करते हुए तथ्यों आदि को प्रस्तुत करने में होना चाहिए, जिससे कि बृहत्तर भारत की अखंड भारतीयता बनी है। हमें उम्मीद है कि हम अपने उद्देश्य में जरूर सफल होंगे।
जयदु जिणवअं, जयदु गोम्मट्टेशं.......
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