वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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हरिवंशपुराण-भाषा-विचार
                                                                                           -वृषभ प्रसाद जैन
अभी कुछ वर्ष पहले मुनिश्री के ही सान्निध्य में अलवर में आदिपुराण की भाषा को लेकर विचार किया गया था, तब भी ये बिन्दु उभर कर आये थे कि पुराण की भाषा का स्वरूप क्या माना जाए; उसे काव्यभाषा माना जाए या शास्त्रभाषा या इतिहासभाषा या कथाभाषा या चरितभाषा आदि-आदि। यह बात भी चर्चायी गयी थी कि पुराणों की भाषा छन्दोबद्ध है, सालंकार है, कहीं-कहीं उक्तिवैचित्र्य को लिये हुए है, कहीं उत्‍तम व्यंग्य है तो कहीं वह केवल तथ्यों या सिद्धान्तों को कह रही है, पर ऐसा भी नहीं है कि वह कल्पनाषीलता से पूरी तरह बाहर हो अर्थात् बहुत्र अभिव्यक्तियाँ काव्यमयी हैं, पर पूरीतरह से वह काव्यभाषा-भर नहीं है और सामान्यभाषा-भर भी नहीं है। कुल मिलाकर यह तथ्य उभरकर आया था कि हमें पौराणिक भाषारूप एक पृथक् कोटि पुराणों के सन्दर्भ में मान लेना चाहिए, जो पुराण की अभिव्यंजना के अनुरूप प्रसंगानुगामी स्वरूप वाली है। अब इसी तथ्य पर यहाँ हम हरिवंशपुराण के सम्बन्ध में विचार करना चाहेंगे।

हरिवंशपुराण सामने है, इसके कुछ-एक अंषों को मैंने कई बार पढ़ा और बार-बार कोषिष की कि पौराणिक भाषा की नियामक कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ सामने आएँ जो इसकी अपनी विषेषताएँ हों। ध्यान से देखें तब भी संस्कृत की वे ही ध्वनियाँ, वे ही प्रत्यय, वे ही शब्द हरिवंशपुराण में प्रयुक्त हुए हैं, जो अन्यत्र हैं। ध्वनियों की दृष्टि से हरिवंशपुराण की कोई अपनी विषेषता नहीं हैं, पर हरिवंशपुराण की भाषा संस्कृत के अन्य प्रतिरूपों की भाषा से विषिष्ट तो है ही। इतना ही नहीं हरिवंशपुराणकार की भाषा के सम्बन्ध में अपनी कुछ विषिष्ट मान्यताएँ भी हैं, इनमें से कुछ सीधे रचनाकार ने कही हैं और कुछ को प्रयोगों के द्वारा दर्षाया है। अब प्रष्न उठता है कि यह विषिष्टता कैसी है? ध्यान से देखने पर चार बातें उभर कर आती हैं-
1. भाषा सम्बन्धी स्पष्टोक्त मान्यताएँ
2. प्रयोग-वैविध्य पर आधारित
3. गठनात्मक वैषिष्ट्य और
4. आर्थी वैषिष्ट्य

हरिवंशपुराणकार आचार्य जिनसेन स्वयं भाषा की विषेषताओं का उल्लेख ब्याजोक्ति से करते हैं और भाषा के बारे में पहली बार अपने ग्रंथ में टिप्पणी करते हुए कहते हैं कि भाषा में सूक्तियों का होना अनिवार्य है, क्योंकि सूक्तियाँ सत्पुरुषों की बुद्धि को विकसित करती हैं-

‘‘बोधयन्ति सतां बुद्धिं (सिद्धसेनस्य) सूक्तयः।’’ -1/30

फिर आगे कहते हैं कि किसी एक वैयाकरण के शास्त्र से बँधा रहना समीचीन नहीं, बल्कि व्याकरण की परंपरा से बँधे रहने की जरूरत है, इसीलिए आचार्य देवनन्दि की वाणी के स्मरण के व्याज से इन्द्र, चन्द्र, अर्क और जैनेन्द्र आदि वैयाकरणों के द्वारा सम्मत वाणी के प्रति आकर्षण की बात ही उन्हें समीचीन लगती है-

‘‘इन्द्र चन्द्रार्कजैनेन्द्रव्यापिव्याकरणेक्षिणः।
(देवस्य देवनन्द्यस्य) न वन्द्यन्ते गिरः कथम्।।’’ -1/31

हरिवंशपुराणकार को माधुर्य गुण से समन्वित, शीलरूपी अलंकार को धारण करने वाली कथाभाषा सुन्दर नयनों वाली वनिता के समान लगती है, इसीलिए वे
- आचार्य महासेन की वाणी में इन विषेषताओं को देखते हैं
‘‘(महासेनस्य) मधुरा षीलालंकारधारिणी।
कथा न वर्णिता केन वनितेव सुलोचना।।’’ -1/33

इसके साथ-साथ वे कविता की भाषा को सूर्य के समान कीर्तिप्रदायिनी मानते हैं, कहते हैं कि जिसप्रकार उत्‍तम स्त्री अपने हस्त, मुख, पाद आदि उत्‍तम अंगों के द्वारा अपने प्रति मनुष्यों के मन में गाढ़ा अनुराग पैदा कर देती है, ठीक वैसे अर्थपूर्ण वाणी के सभी अंग अर्थात् छंद, अलंकार, रीति आदि किस मनुष्य को पान करने के लिए लालायित नहीं करते अर्थात् किस मनुष्य के गाढे़ अनुराग का केन्द्र नहीं बनते अर्थात् सबका बनते हैं। ये भी वक्रोक्ति-प्रधान तथा रम्य उत्पे्रक्षादि अलंकारों से युक्त रमणीयार्थ प्रतिपादक भाषा को ही अनुराग का कारण मानते हैं। यद्यपि इस पुराणकार ने हरिवंशपुराण की रचना पद्यबद्ध रूप में की है, पर भाषिक दृष्टि से वे गद्य-पद्य दोनों प्रकार की भाषा की विषिष्टोक्तियों के ख्यापक हैं-

‘‘.......मूर्तिः काव्यमयी लोके रवेरिव रवेः प्रिया।
वरांगनेव सर्वांगैर्वरांगचरितर्थावाक्।
कस्य नोत्पादयेद् गाढमनुरागं स्वगोचरम् ।।
.......वक्रोक्ती रम्योत्प्रेक्षाबलान्मनः।
कस्य नोद्धाटितेऽन्वर्थे रमणीयेऽनुर०जयेत्।।
योऽषेषोक्तिविषेषेषु विषेषः पद्यगद्ययोः।......’’ -1/34-37

आचार्य जिनसेन की मान्यता है कि भाषिक सम्प्रेषण में सम्यक् ग्रहीता का होना भी अनिवार्य है, क्योंकि सम्यक् ग्रहीता यदि भाषिक सम्प्रेषण का अंग बनता है तो गुणरहित रचना में भी गुणों का निधान स्वतः हो जाता है अर्थात् वह रचना सगुण रचना-सी जान पड़ती है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे कोई नवयौवना वधू जब आम्रमंजरी को अपने कानों में धारण करती है और वह मंजरी किसी धागे आदि से बँधी नहीं होती है, फिर भी उसके गुण-सौन्दर्य को प्रकट करती है। वे और तर्क देते हैं कि जिसप्रकार अग्नि स्वर्ण की कालिमा को अपने आप दूर कर देती है, ठीक वैसे ही यदि रचना की भाषा में कोई दोष रह गए हैं तो मर्मज्ञ साधु पाठक याचना के बिना ही काव्य के दोषों को दूर कर देते हैं, यह भी ठीक वैसे ही है जैसे- समुद्र की लहरें भीतर पड़े हुए मैल को निकालकर बाहर फेक देती हैं, साधु ग्रहीता किसी कारणवष काव्यभाषा के गठन में हुई भूल को दूर करके ही उसका ग्रहण करता है। इतना ही नहीं, बल्कि उनके स्पष्ट विचार हैं कि समुद्र की निर्मल सीपों के द्वारा ग्रहण किया हुआ जल जिसप्रकार मोती बन जाता है, उसी प्रकार सत्पुरुषों की सभा के द्वारा ग्रहण की हुई जड़ रचना भी उत्‍तम रचना के समान चमत्कृत होने लगती है-

निर्गुणाऽपि गुणान् सिः कर्णपूरीकृता कृतिः।
विभत्‍तर्येव वधूवक्त्रैष्चूतस्येवाग्रमजरी।।
साधुरस्यति काव्यस्य दोषवत्‍तामयाचितः।
पावकः शोधयत्येव कलधौतस्य कालिकाम्।।
काव्यस्यान्तर्गतं लेपं कुतिचदपि सत्सभाः।
प्रक्षिपन्ति बहिः क्षिप्रं सागरस्येव वीचयः।।
मुक्ताफलतयाऽऽदानात् परिषिः कृतिः स्फुरेत्।
जलात्मापि वषुद्धाभिस्तोयधेरिव शुक्तिभिः।। -1/42-45

आचार्य के मत में मधुर वाणी जीवन का अलंकार होती है, क्योंकि जिसप्रकार मधुर गर्जना करने वाले मेघ अत्यधिक धूलि से युक्त, रुक्ष और तीव्र तथा दाहक ग्रीष्मकाल को अपने वर्षण से समय आने पर शान्त कर देते हैं, ठीक वैसे ही मधुरभाषी सत्पुरुष अत्यधिक अपराध करने वाले कठोर प्रकृति तथा संताप देने वाले दुष्ट पुरुष को शान्त कर देते हैं-

रजोबहुलमारूक्षं खलं कालं विदाहिनम्।
सन्तः काले कलध्वानाः शमयन्ति यथा घनाः।।’’ -1/47

आचार्य लोकपुराण और शास्त्र पुराण की चर्चा करते हैं तथा कहते हैं कि लोकभाषा में प्रचलित पुराण कुपथ रूप भी हो सकता है, इसलिए विवेकीजन को लौकिक पुराण रूपी भाषा के टेढ़े-मेढ़े कुपथ को छोड़कर सीधे हितप्रद इस शास्त्र पुराणरूपी मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए।

मुक्त्वा लोकपुराणतिर्यगपथभ्रान्तिं विवेकी जनो।
गृह्णातु प्रगुणां पुराणपदवीमेतां हितप्रापिणीम्।। -1/128
समितियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि भाषा का प्रयोग व्यर्थ न हो तथा सम्यक् हो, इसीलिए उनके मत में सदा कर्कष तथा कठोर वचनों को छोड़कर यत्नपूर्वक प्रवृत्ति करनेवाले यति का धर्मकार्यों में बोलना ही भाषा-समिति है-

त्यक्त्वा कार्कष्यपारुष्यं यतेर्यत्नवतः सदा।
भाषणं धर्मकार्येषु भाषासमितिरिष्यते।। -2/123

भाषिक वचन दीपक रूप होते हैं, जो सूर्य और चन्द्रमा के प्रकाष से भी प्रकाषित नहीं होता, भाषिक वचन उस अन्धकार को भी दूर करते हैं, इसलिए वचन प्रकाष रूप हैं, दीप रूप हैं-

‘‘सूर्याचन्द्रमसामगोचरमघोलोकान्धकारं बुधाः।
प्रध्वंस्याऽऽप्तवचःप्रदीपविभवैः सर्वत्रगैः सर्वदा।।’’ -4/384

हरिवंशपुराणकार जिनसेन पूर्व आदि के प्रसंग में भाषा और भाषण के प्रकारों की चर्चा करते हैं। उनके मत में भाषा के बारह प्रकार होते हैं और भाषण दस प्रकार का। भाषा के ये प्रकार हैं-अभ्याख्यान भाषा, कलह भाषा, पैषुन्य भाषा, बद्धप्रलाप भाषा, रति भाषा, अरति भाषा, उपाधिवाक् भाषा, निकृति भाषा, अप्रणति भाषा, सम्यक् दर्षन भाषा, मिथ्या दर्षन भाषा, मोथ भाषा। भाषण के प्रकारों को वे क्रमषः नामसत्य, रूपसत्य, स्थापनासत्य, प्रतीत्यसत्य, संवृतिसत्य, संयोजनासत्य, जनपदसत्य, देषसत्य, भावसत्य व समयसत्य।

हिसांदि पापों के करने वाले के लिए या नहीं करने वाले के लिए ‘‘क्या करना चाहिए’’ - इस प्रकार का कथन जब होता है तो अभ्याख्यान भाषा होती है। जिन वचनों से कलह हो, वह कलह भाषा है। जब कोई व्यक्ति नहीं है, तब उसकी अनुपस्थिति में उसकी बुराई करना पैषुन्य भाषा है। जो पुरुषार्थ चतुष्ट्य से दूर रहते हुए व्यर्थ के कार्यों में फसाएँ वह बद्धप्रलाप भाषा है। रति उत्पन्न करने वाली भाषा को रति भाषा, तथा द्वेषोत्पादक भाषा को अरति भाषा कहा गया है। भाव यह है कि जो भाषा राग का कारण बने वह रति भाषा और जो द्वेष का वह अरति भाषा। जो भाषा अर्थोपार्जन, आजीविका आदि का कारण बने, वह उपाधिवाक् भाषा है। जिस भाषा को प्रयोग करके प्रयोक्ता धोखा देने में माहिर हो जाए, वह निकृति भाषा है। जो भाषा अधिक गुणीजनों के प्रति प्रणाम के लिए अभिप्रेरित नहीं करती, वह अप्रणति भाषा है। जो जीव को चोरी आदि के कार्यों में प्रवृत्‍त कराती है, वह मोघ भाषा तथा जो समीचीन कार्यों में लगाती है, वह सम्यक् भाषा और इसी प्रकार असमीचीन कार्यों में लगाती है, वह मिथ्या भाषा है।

इसी प्रकार आचार्य ने वचन/भाषण के दस भेद गिनाये हैं। वे भी प्रयोजनसापेक्ष हैं। जैसे- पहचान के लिए या नामकरण के लिए जब हम किसी शब्द का विधान करते हैं तो वह वाचक नामसत्य होता है। इसी प्रकार जब किसी शब्द से वस्तु का बोध न हो और उसकी आकृति का बोध हो तो वह रूपसत्य है। जो वस्तु वह नहीं है, जिसको कहने के लिए उसका प्रयोग किया गया है, ऐसा वचन स्थापनासत्य है; जैसे-षतरंज का घोड़ा, बैडमिण्टन की चिड़िया आदि। आगम के अनुसार प्रतीत्यकर स्थिति का कथन करना प्रतीत्य सत्य है तथा सामुदायिक बोध की स्थिति में एक देष की मुख्यता से एकरूप कथन करना संवृति सत्य है। चेतन और अचेतन द्रव्यों के भेद को न करने वाला कथन जहाँ हो, उसे संयोजना सत्य कहते हैं; जैसे- घर। वास्तव में, घर अचेतन है, पर वह घर में रहने वाले गृही का बोध भी कराता है, इसलिए जब चेतन और अचेतन दोनों द्रव्यों का कथन सम्प्रेष्य है, तब संयोजना सत्य होता है। कुछ वचन जनपद सापेक्ष होते हैं अर्थात् आर्य जनपद में प्रचलित हैं, अनार्य में नहीं और ऐसे ही कुछ अनार्य जनपद में प्रचलित हैं, आर्य में नहीं, ऐसे वचनों को जनपद सत्य कहा गया है। जो वचन गाँव की रीति, नगर की रीति, राज्य की नीति का उपदेष्टा है एवं गण व आश्रम का भी उपदेषक हो, वह देष सत्य कहलाता है। यद्यपि छद्मस्थ जीव की ज्ञान की सीमा के कारण उसे द्रव्य का सकल यथार्थ ज्ञान नहीं होता, तथापि वह परंपरा से केवली भगवान् के द्वारा उपदिष्ट को प्रमाण मान कर वस्तु के स्वरूप को समझता है, यह भाव सत्य है। इसी प्रकार जो वस्तु और उसके पर्याय को बताने वाला है तथा आगम के अर्थ का पोषक है, वह समय सत्य है।

‘‘........भाषा द्वादषधा प्राह दषधा सत्यभाषणम्।। हिंसाद्यकर्तुः कर्तुर्वा कर्त्‍तव्यमिति भाषणम्। अभ्याख्यानं प्रसिद्धो हि वागादिकलहः पुनः।। दोषाविष्करणं दुष्टैः प९चात्पैषुन्यभाषणम्। भाषा बद्धप्रलापाख्या चतुर्वर्गविवर्जिता।। रत्यरत्यभिधे वोभे रत्यरत्युपपादिके। आसज्यते यथार्थेषु श्रोता सोपाधिवाक् पुनः।। व०चनाप्रवणं जीवं कर्त्‍ता निःकृतिवाक्यतः। न नमत्यधिकेष्वात्मा सा चाप्रणतिवागभूत्।। या प्रवर्त्‍तयति स्तेये मोघवाक् सा समीरिता। सम्यग्मार्गे नियोक्त्री या सम्यग्दर्षनवागसौ।। मिथ्यादर्षनवाक् सा या मिथ्यामार्गोपदेषिनी। वाचो द्वादषभेदाया वारो द्वीन्द्रियादतः।। दषधा सत्यसावे नामसत्यमुदाहृतम्। इन्द्रादिव्यवहारार्थं यत् संज्ञाकरणं हि तत्।। यदर्थासंनिधानोऽपि रूपमात्रेण भाष्यते। तद्रूपसत्यं चित्रादिपुरुषादावचेतने।। आकारेणाक्षपुस्तादौसता वा यदि वासता। स्थापितं व्यवहारार्थं स्थापनासत्य मुच्यते।। प्रतीत्यवर्तते भावान् यदौपषमकादिकान्। प्रीतत्यसत्यमियत्युं वचनं तद्यथागमम्।। सामग्रीकृतकायस्य वाचकत्वैकदेषतः। वचः संवृतिसत्यं स्यात् भेरीषब्दादिकं यथा।। चेतनाचेतनद्रव्यसंनिवेषाविभागकृत्। वचः संयोजनासत्यं क्रौचव्यूहादिगोचरम्।। यदार्याऽनार्यनानात्वनानाजनपदेष्विह। चतुर्वर्गकरं वाक्यं सत्यं जनपदाश्रितम्।। यद्ग्रामनगराचारराजधर्मोपदेषकृत्। गणाश्रमपदोसि देषसत्यं तु तन्मतम्।। छùस्थे द्रव्ययाथात्म्यज्ञानवैकल्यवत्यपि। प्रासुकाप्रासुकत्वेऽपि भावसत्यं वचः स्थितम्।। द्रव्यपर्यायभेदानां याथात्म्यप्रतिपादकम्। यत्‍तत्समयसत्यं स्यादागमार्थपरंव चः।। -10/91-107

सामाजिक संदर्भों में भाषाई विकल्पों का ऐसा सूक्ष्म विवेचन कहीं अन्यत्र भारतीय साहित्य में नहीं मिलता, आज इस तरह का अध्ययन ज़रूर समाज भाषाविज्ञान की सीमा में होने लगा है, पर इतनी शताब्दियों पूर्व ऐसा चिन्तन निष्चय ही पुराणकार की भविष्य की भाषा चिन्तन सम्बन्धी विलक्षण बौद्धिक दृष्टि का ख्यापक है।

सत्रहवें सर्ग में आचार्य ने ‘‘अजैर्यष्टव्यम्’’ वाक्य को लेकर जो शब्दार्थ सम्बन्ध की बात उठायी है, वह अद्वितीय है। महाभाष्यकार पतंजलि की तरह हरिवंशपुराणकार मानते हैं कि शब्द और अर्थ का जो सम्बन्ध है, वह परंपरासिद्ध है अर्थात् पहले से निष्चित चला आ रहा है, इसलिए उस सम्बन्ध को हम प्रयोक्ताओं को बदलने का अधिकार नहीं है, क्योंकि यदि वैसा किया गया तो भाषिक शब्द के द्वारा बोधित वस्तु के साथ स्थापित जो लोक व्यवहार है, वह ही नष्ट हो जाएगा और जगत् में जो जीव हैं, वह सभी सद्विचारों से युक्त नहीं होते, तŸवद्रष्टा नहीं होते, उनमें से बहुतों की दृष्टि तो अंधे उलूकों जैसी होती है, इसलिए कहीं अन्ध उलूक दृष्टि से बोध्य अर्थ में प्रवृत्ति न हो जाए, इसलिए आचार्य सिद्ध-शब्दार्थ-सम्बन्ध की प्रवृत्ति पर बल देते हैं, क्योंकि उनकी मान्यता है कि शब्द में ही उत्‍तरशब्द की तथा उत्‍तरव्यवहार की प्रवृत्ति है।

सिद्धशब्दार्थसंबन्धे नियते तस्य बाधने।
व्यवहारविलोपः स्यादन्धधूकमिदं जगत्।।
अबाधितः पुनन्र्याये शब्दे शब्दः प्रवर्त्‍तते।
शास्त्रीयो लौकिकष्चात्र व्यवहारः सुगोचरे।। -17/102-103

इसलिए ‘अजैर्यष्टव्यम्’ वाक्य से जो यह अर्थ लिया जा रहा है कि बकरे की आहुति देकर हवन/यज्ञ करना चाहिए, यह अर्थ समीचीन नहीं है। यह तो ग्रहीता की अपनी मनोनुकूल मिथ्या परिकल्पना है, बल्कि तथ्य यह है कि वह प्राचीन धान्य या चावल, जिसमें अंकुरण की शक्ति नहीं रह गयी है, अज है; ऐसे धान्य को अर्पित करके ही यज्ञ किया जाता है या किया जाना चाहिए क्योंकि यज्ञ का चरम लक्ष्य तो सुखदायक है न, पर जिसको यज्ञ में झोंका जा रहा है या जिसकी आहुति दी जा रही हैै, उसके लिए वह सुखदायक कैसे होगा? इसलिए उसको करने वाले के लिए भी वह सुखदायक नहीं हो सकता है, क्योंकि जब आहुति होगी तो उससे पूरा परिदृष्य प्रभावित होगा। आचार्य जिनसेन कहते हैं कि वेद में/षास्त्र में शब्दार्थ की व्याख्या ग्रहीता के अभिप्राय से नहीं होती, बल्कि जो आप्तजन हैं, उनके द्वारा स्थापित परंपरा से, उनके उपदेष से होती है। भाव यह है कि गुरुओं की पूर्वपरंपरा में ही शब्दों के अर्थ का निर्धारण करना चाहिए, अन्यथा अनर्थ हो जाएगा। हम परंपरा भी खो बैठेंगे और मिथ्या अर्थ को ग्रहण करने लगेंगे तो फिर हम कहाँ बचेंगे?

अजैरित्यादिके वाक्ये यन्मृषा पर्वतोऽब्रवीत्।
अजाः पशव इत्येवमस्यैषा स्वमनीषिका।।
स्वाभिप्रायवषाद् वेदे न शब्दार्थगतिर्यतः।
वेदाध्ययनवत्साप्तादुपदेषमुपेक्षते।। -17/115-116

इसी प्रसंग में वे तर्क देते हैं कि एक गुरु के तीन षिष्य थे-वसु, नारद और पर्वत। पर्वत अज का अर्थ बकरा ले रहा है। यह उसकी स्वयं की परिकल्पना है, क्योंकि गुरु ने तो अज का अर्थ पुराना धान्य ही कहा था और पर्वत अगर यह तर्क दें कि गुरु ने अज का अर्थ उसे बकरा बताया था, तो वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि गुरु का आचरण कभी ऐसा नहीं होता कि वह एक षिष्य को एक वाक्य का एक अर्थ बताए और अन्य षिष्यों को दूसरा, क्योंकि उसे तत्वदर्षयिता होना है न। इस भिन्न कथन से गुरु कोई सम्प्रदाय भी खड़ा करते नहीं दिखते, क्योंकि संप्रदाय की स्थापना में भी तो शुभ भाव की परिकल्पना होती है ।
न चायं संप्रदायोऽस्मायेक्स्मै गुरुणोदितः। त्रयः षिष्याः वयं योग्या वसुनारदपर्वताः।। समानश्रुतिकाः शब्दाः सन्ति लोकेऽत्र भूरिषः। गवादयः प्रयोगोऽपि तेषां विषयभेदतः।। -17/120-121 जो होती नहीं दिखती। इसलिए यहाँ बोधव्य है कि धान्य से ही यज्ञ किया जाए।

‘‘.........ब्रीहयोऽजाः पदार्थोऽयं वाक्यार्थो यजनं तु तैः।’’ -17/128

वस्तुतः शब्दों के अर्थ में जो प्रवृत्ति होती है, वह या तो रूढ़ि से होती है या क्रिया से और जो भूल होती है, वह इसलिए जब गुरु वचन को प्रमाण न माना जाए तो वह अर्थ ओझल हो जाता है और इस प्रकार पर्वत को गुरु प्रतिपादित अर्थ विस्मृत हो गया है।

रूढ्या क्रियावषाद्वाच्ये वाचां वृत्‍तरवास्थिता।
तामस्थिरोपदेषास्तु विस्मरन्ति गुरूदितम्।। -17/124

हरिवंशपुराण के विषय में एक मिथ्या धारणा लोक में प्रचलित है। लोग कहते हैं कि हरिवंशपुराण यदि घर में रखा जाए, उसकी कथा को पढ़ा जाए तो झगड़े होते हैं, कलह होती है, पर मुझे लगता है कि तथ्य यह नहीं है, बल्कि तथ्य यह है कि हरिवंशपुराण की भाषा में प्रवृत्ति किस दृष्टि से हो रही है, वह दृष्टि महत्वपूर्ण है। यदि पुराण के द्वारा प्रतिपादित चरम लक्ष्य के प्रति ग्रहीता की दृष्टि है तो वहीं उल्लिखित युद्ध और कलह का वर्णन युद्ध और कलह का कारण नहीं हो सकता, बल्कि विरक्ति का कारण बनता है, जो कल्याणकारक है और ऐसी स्थिति में वह युद्ध के लिए प्रेरित नहीं करता। इतना ही नहीं, वह यदि उपास्य भक्ति भाव से हरिवंशपुराण से जुड़ रहा है तो किसी भी स्थिति में ग्रहीता को कल्याण पक्ष से भटका नहीं सकता। इसीलिए स्वयं गौतम स्वामी के मुख से आचार्य कहलाते हैं कि जो भक्तजन भक्तिभाव से इस पुराण में उल्लिखित भगवान वृषभदेव आदि के कल्याणकों का वर्णन पढ़ता है या सुनता है, वह संसार में ही कल्याण को पाता है।

स्वर्गावतारजननाभिषवद्विभेद कल्याणवर्णनमिदं वृषभेष्वरस्य।
भक्त्या सदा पठति योऽत्र शृणोति यष्च कल्याणमेति स जनो जिनभास्करस्य।। -8/237

अब पूरे हरिवंशपुराण की भाषा को देखिए। प्रारम्भ में मंगलकारी तीर्थकरों का स्मरण है, फिर तŸवों, भूगोल आदि का वर्णन, जिसका चरम लक्ष्य वस्तु तत्व का यथार्थ बोध कराना है और जब उससे होकर कोई पाठक या द्रष्टा गुजरता है तो वह लक्ष्य ही देखता है और जब इस पुराण का लक्ष्य भी हमें हमारे स्वरूप में रमण कराने की ओर प्रवृत्‍त करना ही है तो वह निरंतर संसार से विरक्त भाव की ओेर उन्मुख होता चलेगा। इसीलिए प्रारम्भ के सात सर्गों के वर्णन में कथाएँ लगभग नहीं है। चरित्रों के रचने का या प्रस्तुत करने का प्रसंग आठवें सर्ग से प्रारम्भ होता है। इसलिए प्रारम्भ के सर्गों की भाषा शास्त्रभाषा है और फिर इसके बाद भाषा में काव्य के गुण दिखने लगते हैं। नवमें सर्ग में ऋ़षभदेव की बालक्रीड़ा की भाषा बड़ी विलक्षण है। उसके द्वारा बोध्य अर्थ भी अनुपम है। यहाँ हरिवंशपुराणकार की कविरूप की परिकल्पना देखिए। वे कहते हैं कि ऋषभदेव का बालरूप चन्द्रमा और सूर्य की आभा से भी विलक्षण है, क्योंकि चन्द्रमा तो अपनी चाँदनी से रात में ही आनन्दानुभूति कराता है और सूर्य अपनी दीप्ति से दिन में ही, परंतु बाल ऋषभदेव का मुख ऐसा अनुपम है कि दिन-रात के भेद के बिना निरंतर अपने दर्षकों को आनन्द रस से भरता रहता है। क्या सजीव में अजीव उद्भावना है कवि की!

चन्द्रश्चन्द्रिकयारात्रौ दिवादीप्त्या दिवाकरः ।
मुदे त्रिभुवने न स्यात् तस्य ताभ्यां तयोर्मुखम्।। -9/13

और आगे चैदवें सर्ग में जब आप पहुँचते हैं तो श्लेष अलंकार की शृखंला दिखती है। राजा सुमुख और उनकी नगरी कौषाम्बी के वर्णन में ।

रत्नचित्राम्बरधरा या प्रासादमुखैर्घनान्।
वर्षानिषास्विव स्निग्धान् लेढि प्रौढाभिसारिका।।
दोषाकरकराप्राप्ता रत्नभूषार्चिषां चयैः।
लेभे बहुलदोषासु परभागं सतीव या।।
पुर्याः प्रभुरभूत्‍तस्याः प्रतापप्रभवो नृपः।
सवितेव कराक्रान्तदिक्चक्रः सुमुखः सुखी।।
वर्णसंकरविक्षेपिधनुषेन्द्रिधनुर्गुणैः।
यस्याधिक्षिप्तमक्षिप्तवर्णसंकरदोषकम् ।। -14/4-7

ऐसी अद्भुत श्लेष की छटा अन्यत्र दुर्लभ है। एक और प्रसंग देखिए- मालतीवल्लभ का। कवि कहते हैं कि जिस प्रकार कोई पुरुष चिरकाल के वियोग से कृषकाय अपनी वल्लभा को गाढ़े आलिंगन से पुष्ट कर पुष्पवती (रक्तवती) बना देता है, उसी प्रकार चैत्रमास चिरकाल से वियुक्त सूखी लता रुपी वल्लभा को अपने आलिंगन से पुष्ट तथा फूलों से व्याप्त कर देता है। मालतीवल्लभां मासश्चिवरविष्लेषषोषिताम्। चकाराष्लेषपुष्टांङ्गी सद्यः पुष्पवतीं मधुः।। -14/19
ऋतुओं का वर्णन कवि का अद्भुत है। वे कहते हैं कि शरद ऋतु आई है और वह जान पड़ती हैं मानों वर्षा रूपी स्त्री के चले जाने पर एक दूसरी अपनी ही स्त्री आई हो अर्थात् वह शरद ऋतु स्त्री के समान जान पड़ती थी, क्योंकि जिस प्रकार स्त्री कमल के समान मुख वाली होती है, ठीक वैसे ही वह शरद् ऋतु कमल से समन्वित मुख वाली थी। इतना ही नहीं जिस प्रकार नव यौवना स्त्री लाल अधरोष्ठों  युक्त होती है, उसी प्रकार वह शरद ऋतु भी बन्धूक के फूलों से सुषोभित होती है। जिस प्रकार स्त्री हाथ में चमर लिये रहती है, वह ऋतु भी फूल रूपी चमर लिए होती है। जिस प्रकार स्त्री उज्जवल वस्त्रों से युक्त होती है, उसी प्रकार वह शरद की उज्ज्वल मेघ रूपी वस्त्रों से युक्त थी। उत्प्रेक्षा और श्लेष का अनुपम योग है इस छन्द में-

प्राप्ता कदाचिदथ तं शरदम्बुजास्या बन्धूकबन्धुरतयाधरपल्लवश्रीः।
काषाच्छचामरकरा विशदाम्बुज्वस्त्रा वर्षावधूव्यतिगमे स्ववधूरिवैका।। -16/22

गगन में मेघ छाये हैं, पर अचानक कुछ समय बाद प्रचण्ड वायु के वेग के तीक्ष्ण आघात से उस मेघ के समस्त अवयव नष्ट हो गए और वह ज्वालाओं के समीप रखे हुए नवनीत के पिण्ड के समान शीघ्र ही विलीन हो गया। मुनिसुव्रतनाथ यह सब देख रहे हैं। उनके मन में विचार उठते हैं-अरे! यह शरद ऋतु का मेघ इतनी जल्दी कैसे विलीन हो गया! आयु, शरीर, वायु की क्षण भंगुरता को भगा देने वाले व्यापक उपदेष देने के लिए ही मानो यह विलीन हुआ है और वही मेघ का विलीन होना, जो वे वर्षो से देख रहे थे, पहले कभी कारण नहीं बना, आज कारण बन जाता है वैराग्य का।

पश्चात्प्रचण्डतरमारुतवेगघातनिर्मूलितावयवमाषु विलीयमानम्।
ज्वलोपनीतमिव तं नवनीतपिण्डमालोक्य लोकविभुरित्थमचिन्तयत्सः।।
शीर्णः शरज्जलधरः कथमेष शीघ्रमायुःषरीरवपुषां विशरारुतायाः।
लोकस्य विस्मरणषीलविषीर्णबुद्धेराषूपदेषमिव विश्वगतं वितन्वन्।। -16/31-32
इससे स्पष्ट होता है कि भाषा की सर्वथा एक ही अर्थ की ओर प्रवृत्ति नहीं होती, परिस्थिति बदलती है, प्रवृत्ति बदलती है।

और आगे चलें पैंतीसवें सर्ग में सारे कारण मौजूद हैं। हम रास का अंग भी बन रहे हैं और दूर भी हैं, हम संसार में हैं, पर अलग भी हैं - ऐसा निर्विकार रूप है कृष्ण का। कवि को लगता है कि ऐसा कैसे हो सकता है पर फिर उसे उपालम्भ मिल जाता है उपमा का और वह कहता है कि वे श्रीकृष्ण रसक्रीडाओं के समय गोपबालाओं को अपने हाथ की अंगुलियों के स्पर्ष से सुख तो उत्पन्न कराते थे, पर गोपबालाओं की हस्तांगुलि का अपने शरीर से स्पर्ष होने पर भी स्वयं निर्विकार रहते थे-यह ठीक वैसे ही था, जैसे अँगूठी में श्रेष्ठ रत्न स्त्री के संस्पर्ष के बाद भी निर्विकार रहता है। खेल के समय कृष्ण को पाकर जिस प्रकार लोगों को प्रसन्नता होती थी, उसी प्रकार उनके अभाव में विरहजन्य संताप भी।

कराङ्गुलिस्पर्षसुखं स रासेष्वजीजनद्गोपवधूजनस्य।
सुनिर्विकारोऽपि महानुभावो मुमुद्रिकानद्धमणिर्यथाघ्र्यः।।
यथा हरौ भूरिजनानुरागो जगाम वृद्धिं हृदि वृद्धिसूची।
तथास्य तेने विरहानुरागो विहारकाले विरहातुरस्य।। -35/66-67

इसी सर्ग में द्वारिका का वर्णन, प्रद्युम्न का वर्णन, शम्बु की चेष्टाओं का वर्णन, युद्ध का उत्कर्ष, यादवों की जलक्रीडा, मार्ग में कुछ पशुओं का दृष्य, भगवान नेमिनाथ के विहार का वर्णन, द्वैपायन मुनि का द्वारिका को भस्मीभूत करना आदि की भाषा बड़ी सजीव है। लगता है सामने घटना घट रही हो, चित्र उपस्थित हो रहे हों, हम स्वयं साक्षी हों उन पूरी घटनाओं के। कृष्ण की मृत्यु हो जाती है। बलदेव लौटते हैं, पाते हैं कि कृष्ण नहीं रहे, उन्हें लगता है कि शायद चुपचाप हैं, पर हैं, सो रहे हैं, सोने दिया जाए, जागने की प्रतीक्षा करने लगते हैं, पर जब कृष्ण बहुत देर तक नहीं जगते तो वे कहते हैं कि हे वीर इतना अधिक क्यों सो रहे हो, बहुत हो गया, निद्रा छोड़ो और इच्छानुसार जल पिओ और फिर चुप बैठ जाते हैं।

वीर! किं स्वपिषि दीर्घमित्यलं स्वापमुज्झ पिब तोयमिच्छया।
इत्युदीर्णमधुरस्वरः पुनः सन्नि‍रुद्धवचनोऽवतिष्ठते।। -63/10

इसके कुछ देर बाद उन्हें बोध होता है कि कृष्ण अब नहीं रहे। हाय! यह कृष्ण मारा गया। यहाँ कृष्ण नहीं मैं मारा गया क्योंकि मैं कृष्ण को पानी उपलब्ध न करा सका। यह कृष्ण प्यास  मर गया। बस, इसके बाद विलाप की ऐसी करुण अवस्था है, वह भवभूति के करुण रस से और अधिक कारुणिक है, हा! जगत् के प्रिय, हा! जगत् के स्वामी, हा! जगत् के पालनकर्ता, मुझे छोड़ कर कहाँ चले गये? इसप्रकार कहते हुए वे चिरकाल तक रोते रहते हैं।

हा जगत्सुभग! हा जगत्पते ! हा जनाश्रयण! हा जनार्दन! हापहाय गतवानसि क्व मां हानुजैहि लघु हेति चारुदत्।।
हारि वारि परितापहारि तं पाययत्यपि विचेतनं मुहुः। क्राम्यतीषदपि तन्न तद्गले दूरभव्यमनसीव दर्षनम्।। -63/20-21

कुल मिलाकर अंत में मैं फिर इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि इस पुराण की भाषा को कथा भाषा, चरित भाषा, काव्य भाषा, शास्त्र भाषा, तथ्य भाषा, सत्य भाषा, विचार भाषा आदि के लक्षणों से संयुक्त मानना ही समीचीन है, क्योंकि इनमें से किसी एक रूप को प्रधान मान लिया गया तो पुराण का सम्यक् आकलन नहीं होगा, बल्कि उस रूप का आकलन होगा, जिसमें वह बात कही गयी है। इसलिए हरिवंशपुराण की भाषा विषयानुसारिणी व प्रसंग-प्रतिपादिनी भाषा लग रही है, जो जैसी वस्तु रचनाकार को जहाँ अभिप्रेत है, वहाँ वही भाषा प्रयुक्त हुई है। सामान्यतया भाषा-प्रयोगों को देखें तो कृदन्तीय प्रयोगों की बहुलता है, समापिका प्रयोगों की अपेक्षा। प्रक्रिया के क्रिया रूपों का प्रयोग भी खूब किया है रचनाकार ने, पर भाषा बोझिल नहीं है, जटिल नहीं है, है यथातथ्य कथ्या और स्वरभाषिक लेकिन अन्य पुराणों से अंतर है। यहाँ काव्यभाषा का प्रारंभ पहले सर्ग से ही नहीं होता, वह उत्‍तरवर्ती सर्गों में और अधिक प्रभाव के साथ व्यक्त हुई है और वहीं उसकी भाषा का उत्कृष्ट रूप भी दिखता है। यद्यपि आचार्य अर्थग्रहण में परंपरा को प्रधान मानते हैं, पर इन्होंने बहुत्र अर्थों को नवीन छटाएँ विषेष प्रयोगों के माध्यम से स्थापित की है, जिसकी चर्चा यहाँ किया जाना सम्भव नहीं हो पा रहा है।
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