वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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गुणस्थान, लेश्‍या और दिव्यध्वनि
वृषभ प्रसाद जैन

प्रोफेसर व अध्यक्ष: भाषा-विद्यापीठ
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय, वर्धा


वस्तुतः गुणस्थान और लेश्‍क का संबंध संसार से या संसारी जीव से है और दिव्यध्वनि जीव के मुक्त होने की राह पर आगे बढ़ने पर या लगभग 14वें गुणस्थान के अंतिम पड़ाव से पहले पड़ाव अर्थात् 13वें गुणस्थान पर पहुँचने पर होने वाली उसकी उद्घोशणा, पर जिनवाणी में तीनों अवधारणाओं का लक्ष्य जीव को उसकी यथार्थ स्थिति का भान कराकर परमात्म दषा की ओर ले जाने में है। यद्यपि आयोजकों के द्वारा मुझे इस गोष्ठी में केवल दिव्यध्वनि पर बात करने का निर्देश दिया गया था, परंतु गुणस्थान की संगोष्ठी में केवल दिव्यध्वनि पर बात करना बहुत करना प्रासांगिक न लगा, इसीलिए दिव्यध्वनि को लक्ष्यकर प्रारंभ की दोनों अवधारणाओं पर भी इस आलेख में संक्षेप में चर्चा की जाएगी, पर बात हम पहली दोनों अवधारणाओं से ही प्रारंभ करना चाहेंगे।

सन् 1925 में बाराबंकी, उत्तरप्रदेश से प्रकाषित ‘‘बृहत् जैन शब्दार्णव’’ में पृ. 445 पर पं. श्री बिहारीलाल जी ‘‘गोमट्टसार, जीवकाण्ड’’ ग्रंथ की गाथा-8 के उल्लेख से ‘‘गुणस्थान’’ के प्रसंग में लिखते हैं कि ‘‘मोहनीय आदि कर्मों के उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम परिणाम रूप जो अवस्था-विषेश उनके होते हुए जो जीव के भाव होते हैं, उनसे जीव ‘गुण्यते’ अर्थात् पहचाने जाते हैं, उन भावों को ‘‘गुणस्थान’’ कहते हैं।’’ यहाँ भी बात बहुत स्पष्ट है कि इन भावों में होने वाली जीव की स्थिति ही उसकी अवस्था के पहचान के कारण हैं, इसलिए इनके अनुसार ‘‘गुणस्थान’’ जीव की स्थिति के परिचायक होते हैं।

जैन दर्षन पारिभाषिक कोश में पृष्ठ 89 पर मुनि श्री क्षमासागर जी ‘‘गुणस्थान’’ को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि ‘‘मोह और योग के माध्यम से जीव के परिणामों में होने वाले उतार-चढ़ाव को गुणस्थान कहते हैं। जीवों के परिणाम यद्यपि अनन्त हैं, परंतु उन सभी को चौदह श्रेणियों में विभाजित किया गया है।’’ पर मुझे लगता है कि गुणस्थान की अवधारणा मोह और मन, वचन व काय की प्रवृत्ति के कारण संसारी जीव के अन्तरङ्ग परिणामों में प्रतिक्षण होने वाली उतार-चढ़ाव की स्थिति को दर्षाती है और यह उतार-चढ़ाव का क्रम 10वें गुणस्थान तक जारी रहता है तथा 2रे व 11वें गुणस्थान से तो केवल अवरोहण/उतार ही होता है, न कि आरोहण, अतः ये 2रे व 11वें गुणस्थान तो जीव की पतनोन्मुख दषा के बोधक हैं और 12वें गुणस्थान से तो केवल आरोहण ही होता है, अवरोहण नहीं, उतार नहीं और अंततः जीव 13वें व 14वें गुणस्थान से ऊध्र्वारोहण करता हुआ मोक्ष-षिखर पर पहुँचकर ही रहता है। भाव यह है कि गुणस्थान की अवधारणा हर क्षण-विषेश में होने वाली अन्तरङ्ग परिणामों के 11वें गुणस्थान तक उतार-चढ़ाव की स्थिति को और उसके बाद की केवल आरोहण की स्थिति को सामने रखती है, न कि परिणामों के सामान्य उतार-चढ़ाव को। इसीलिए पंचसंग्रह के प्राकृत अधिकार 1/3 में आचार्य कहते हैं कि-

जेहिं दु लक्खिजंते उदयादिषु संभवेहिं भाघेहिं।
जीवा ते गुणसण्णा णिद्दिट्ठा सव्वदरिसीहिं।।

अर्थात्- दर्षनमोहनीयादि कर्मों की उदय, उपशम, क्षय, क्षयोपशम आदि अवस्थाओं के होने पर उत्पन्न होने वाले जिन भावों से जीव लक्षित किये जाते हैं, उन्हें सर्वदर्षियों ने गुणस्थान संज्ञा से निर्देश किया है। यही बात गोमट्टसार, जीवकाण्ड 3/22 में निम्न प्रकार से कही गई है-
संखेओ ओघोत्ति य गुणसण्णा सा च मोहजोगभवा।

अर्थात् संक्षेप, ओघ, -ऐसी जो गुणस्थान संज्ञा है, वह मोह और मन, वचन, काय के योग से उपजी है। संभवतः इसीलिए मुनि-श्री प्रमाण सागर जी अपनी पुस्तक जैन धर्म और दर्षन, पृ. 233-34 में ‘‘मोह और मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के निमित्त से उत्पन्न जीव के अन्तरंग परिणामों की तर-तमता को गुणस्थान कहते हैं।.....जीव के परिणाम सदा एक-से नहीं रहते। मोह और मन, वचन, काय की प्रवृत्ति के कारण जीव के अंतरंग परिणामों में प्रतिक्षण उतार-चढ़ाव होता रहता है। गुणस्थान आत्म-परिणामों में होने वाले इन उतार-चढ़ावों का बोध कराते हैं। साधक कितना चल चुका है तथा कितना आगे और चलना है? ... गुणस्थान इसे बताने वाला मार्ग-सूचक-पट्ट है।...’’

अब एक प्रश्‍न और उठता है कि गुणस्थान की अवधारणा जैन विचार या विवेचना शास्त्र में आखिर क्यों गढ़ी गई?...इसका उत्तर भी राजवार्तिककार यूँ देते हैं- तस्य संवरस्य विभावनार्थं गुणस्थानविभागवचनं क्रियते। -9/1/10/588

भाव यह है कि संवर के स्वरूप का विषेश परिज्ञान कराने के लिए गुणस्थानों का विवेचन किया जाता है अर्थात् गुणस्थान की अवधारणा न हो, तो जीव को अपनी स्थिति का बोधक पैमाना न मिले और जब पैमाना न मिलेगा, तो वह अपना आकलन कैसे करेगा?....और फिर कैसे करेगा अपने कर्मों का संवर?....इसीलिए राजवार्तिककार कहते हैं कि संवर के लिए आचार्यों को गुणस्थान की अवधारणा देना अपरिहार्य थी।
अब हम दूसरे बिंदु लेष्या पर आते हैं। जैन दर्षन पारिभाषिक कोश में पृष्ठ- 209-210 पर मुनि-श्री क्षमासागर जी ‘‘लेष्या’’ को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि ‘‘जो आत्मा को शुभाषुभ भावों से लिप्त करे, उसे लेष्या कहते हैं। लेष्या छह प्रकार की है- कृष्ण, नील, कापोत, पीत, पद्म व शुक्ल लेष्या। कृष्ण, नील और कापोत - ये तीन अषुभ लेष्याएँ हैं। पीत, पद्म और शुक्ल- ये तीन षुभ लेष्याएँ हैं। छहों लेष्याएँ द्रव्य व भाव के भेद से दो-दो प्रकार की हैं। शरीर के काले, सफेद आदि रंग को द्रव्य-लेष्या कहते हैं तथा कषाय से अनुरंजित जीव के मन, वचन, काय की प्रवृत्ति को भाव-लेष्या कहते हैं।’’
सन् 1925 में उत्तरप्रदेश के बाराबंकी जिले से प्रकाषित ‘‘बृहत् जैन शब्दार्णव’’ में पृ. 603-605 पर पं. श्री बिहारीलाल जी ‘‘लेष्या’’ के प्रसंग में लिखते हैं कि ‘‘लेष्या दो प्रकार हैं-द्रव्य लेष्या-शरीर का वर्ण; भाव लेष्या, जिसके द्वारा संसारी जीव पाप-पुण्य से लिपे बँधे हैं। मन, वचन, काय, योगों की प्रवृत्ति, जो कषाय के उदय से अनुरंजित हो या रँगी हुई हो, उसको भावलेष्या कहते हैं। इनमें योगों से प्रकृति व प्रदेश बंध, कषाय से स्थिति व अनुभाग बंध होता है।’’..... ‘‘असंयत सम्यग्दृष्टि चार गुणस्थान तक छह लेष्याएँ, देशसंयत, प्रमत्त, अप्रमत्त के तीन शुभ लेष्याएँ। अपूर्वकरण, सयोगी तक - एक पù।..’’ यहाँ खास विचारणीय बात यह है कि लेष्या का संबंध संसारी जीवों से ही है, मुक्त जीवों से नहीं, अयोग केवली से भी नहीं, क्योंकि उनमें राग और कषाय नहीं रहते और लेष्या का संबंध राग और कषाय के बिना होता नहीं। द्रव्य-लेष्या आयु-पर्यंत एक ही रहती है, पर भाव-लेष्या जीवों के परिणामों के अनुसार बदलती रहती है -क्षु. जिनेन्द्र वर्णी।

पंचसंग्रह प्राकृत, 183-184 में उल्लेख आता है कि कृष्ण लेष्या भौंरे के समान वर्ण वाली, नील लेष्या नीलमणि या मयूरकण्ठ के समान वर्ण वाली, कापोत लेष्या कबूतर के समान वर्ण वाली, पीत लेष्या तेजो तप्त सुवर्ण के समान वर्ण वाली, पù लेष्या पù के समान वर्ण वाली और शुक्ल लेष्या कांस के फूल के समान ष्वेत वर्ण वाली है-
किण्हा भमर-सवण्णा णीला पुण णील-गुलिय-संकासा। काऊ कओदवण्णा तेऊ तव णिज्जवण्णा दु।। पम्हा पउमसवण्णा सुक्का पुणु कासकुसुमसंकासा। वण्णं तरं च एदे हवंति परिमिता अणंता वा।।

अब गुणस्थान और लेष्या पर संक्ष्प्ति चर्चा के बाद हम दिव्यध्वनि की ओर बढ़ते हैं। दिव्यध्वनि को तीर्थंकर के आठ प्रातिहार्यों में से एक प्रातिहार्य माना गया है। क्षीणमोह गुणस्थान को पार करता हुआ जैसे ही जीव सयोग केवली नामक गुणस्थान में पहुँचता है और समोशरण रचा जाता है, वैसे ही केवली जिनेन्द्र गणधर के माध्यम से धर्मोपदेश देने के लिए जिस दिव्य वाणी को निगदित करते हैं, वह दिव्य वाणी ही दिव्यध्वनि कहलाती है। यह दिव्यध्वनि, यह केवली जिनेन्द्र की दिव्य वाणी धरर्मोपदेश देने के लिए एक योजन पर्यंत तक व्याप्त रहती है व यह तालु, ओठ, कण्ठ आदि की चंचलता से रहित और अक्षरविहीना होती है। (द्रष्टव्य म.पु. 24.82,ह.पु. 2-113, 3-38-39 पापु. 1-119 भी)। यथा-

अपरिस्पन्दताल्वादेरस्पष्टदशनद्युतेः।
स्वयम्भुवो मुखाम्भोजाज्जाता चित्रं सरस्वती।। -म.पु. 1-184

यह विवक्षारहित होती है और विष्व का हित करती है। यह नानाभाषामयी और व्यक्त-अक्षरा होकर अनेक देशों में उत्पन्न मनुष्यों, देवों और पशुओं के संदेह का नाश कर धर्म के स्वरूप का कथन करती है। जिसप्रकार मेघमाला अवषिष्ट धूलि के समूह को शांत कर देती है, उसीप्रकार जिनेंद्र भगवान की सद्धर्म-देशना जगत्त्रय के जीवों की समस्त भ्रांति को शांत करती है-

सद्धर्मदेशना जैनी जगत्त्रयतनूभृताम्।
भ्रान्तिषेशरजःषेशमभ्रालीवाभ्यषीशवत्।। - ह.पु. 3@181

सर्व भाषाओं में परिणमन होने का स्वभाव होने से सभी इसे अपनी भाषा में समझ लेते हैं। यह गणधर की अनुपस्थिति में नहीं खिरती है। (द्रष्टव्य म.पु. 24-84, ह.पु. 2-113, 58-5, वीवच. 15-14-17, 78-82 भी)। यथा-

विवक्षया बिनैवास्य दिव्यो वाक्प्रसरोऽभवत्।
महतां चेष्टितं चित्रं जगदभ्युज्जिहीर्षताम्।।
एकरूपापि तद्भाषा श्रोतृन प्राप्य पृथग्विधान्।
भेजे नानात्मतां कुल्याजलस्रुतिरिवाङ्घ्रिपान्।। -म.पु. 1-186-87,

जैन दर्षन पारिभाषिक कोश में ही पृष्ठ- 117 पर मुनि क्षमासागर जी ‘‘दिव्यध्वनि’’ को परिभाषित करते हुए लिखते हैं कि ‘‘केवलज्ञान होते ही अर्हन्त भगवान् के मुख से जो सब जीवों का कल्याण करने वाली ओंकार रूप वाणी खिरती है, उसे दिव्यध्वनि कहते हैं। यह सर्व भाषाओं से युक्त होती है और मनुष्य, तिर्यंच आदि सभी की भाषा में सुनायी देती है। तीर्थंकर के समवशरण में सुबह, दोपहर, शाम और अर्द्धरात्रि के समय छह-छह घड़ी तक दिव्यध्वनि खिरती है। इसके अतिरिक्त गणधर, इन्द्र या चक्रवर्ती आदि के द्वारा प्रश्‍न पूछे जाने पर शेश समयों में भी दिव्यध्वनि खिरती है।’’

दिव्य निनाद दिव्यध्वनि का वह रूप है, जिसमें तीर्थंकर का दिव्य उपदेश होता है। -उ.पु. 48-51। -जैन पुराण कोश, पृ. 164। जैन पुराण कोशकारों ने दिव्य ध्वनि के एक अंश को दिव्य निनाद संज्ञा दी है, इससे ऐसा लगता है कि दिव्यध्वनि का मूलरूप, जिसमें तीर्थंकर का दिव्य उपदेश होता है, दिव्य निनाद के रूप में प्रस्फुटित होता है और इसी का उत्तर रूप संभवतः दिव्यध्वनि कहा जाता है। वात्सल्यरत्नाकर ग्रंथ में पृ. 64 पर तिल्लोयपण्णत्ति के संदर्भ से उल्लेख है कि ‘‘सर्वज्ञ तीर्थंकर प्रभु की वाणी को दिव्यध्वनि कहते हैं। यह निरक्षरात्मक व बीजाक्षर एकरूप होती है। जिसप्रकार वर्षा का जल एक होकर भी भूमि, वृक्ष, सीपादि आधार को प्राप्त कर अनेक रूप हो जाता है, उसी प्रकार भगवान की वाणी भी श्रोताओं के कर्णप्रदेश में जाकर उन-उन की भाषा रूप में परिणमित हो जाती है। यह दिव्यध्वनि भव्यजीवों को छह द्रव्य, नव पदार्थ, पंचास्तिकाय तथा सप्त तत्त्व का नाना प्रकार के हेतओं द्वारा निरूपण करती है’’-
छदव्व-णव-पयत्थे, पंचट्ठीकाय-सत्त तच्चाणि।
णाणाविह-हेदूहिं, दिव्वझुणी भणइ भव्वाणं।। 914।।

दिव्यध्वनि को लेकर मिलने वाले शास्त्रोल्लेखों के आधार पर दो बिंदुओं को लोग विवाद का विशय बनाते हैं, ये बिंदु हैं- 1- दिव्यध्वनि भगवज्जिनेन्द्र के मुख से खिरती है या सर्वांग से, 2- दिव्यध्वनि अक्षरात्मक है या अनक्षरात्मक अथवा एक-भाषामय है या सर्वभाषामय; लेकिन मुझे तो लगता है कि दिव्यध्वनि को लेकर ये दोनों बिंदु विवाद के विशय ही नहीं होने चाहिए, क्योंकि वैयाकरणों के शब्दब्रह्म के स्फोट तत्त्व की अवधारणा से ये दोनों बिंदु बहुत अंषों में मेल खाते हैं। शब्दब्रह्म की व्याख्या करते हुए वाक्यपदीयम् में वैयाकरण भर्तृहरि कहते हैं-
अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः।। - ब्रह्मकाण्ड, 1

भाव यह है कि आदि और अन्तरहित जो अक्षर/अविनाषी तत्त्व है, वही शब्दब्रह्म है और वही अर्थरूप से भासित होता है और उसी से जगत् की प्रक्रिया चलती है, यहाँ मुझे लगता है कि आचार्य का मंतव्य यह है कि शब्द और अर्थ तत्त्व शब्दब्रह्म के स्तर पर संयुक्त हैं और चूँकि इन्हीं की युति में अनंत सत्य को उद्घाटित करने वाला अनंत ज्ञान रहता है, अतः ब्याज से आचार्य ने इन्हें अक्षर/अविनाषी कहा है। षिष्ट की व्याख्या करते हुए वैयाकरण श्री कैयट अपने महाभाष्य के व्याख्यान में लिखते हैं कि ‘‘सदाचार के निरंतर अनुष्ठान के अभ्यास से अंतःकरण की शुद्धि होने से अविद्यानिवृत्तिपूर्वक दिव्य ज्ञान जिनको प्राप्त हो गया हो, और बिना गुरु के उपदेश अथवा अभ्यास के ही सब विद्याओं में पारंगत हों, वे ही वास्तविक षिष्ट और शब्दों के साधुत्व ज्ञान में प्रमाणभूत वैयाकरण हैं।.........
आविर्भूतप्रकाषानामनुपप्लुतचेतसाम्।
अतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान्न विषिष्यते।।
अतीन्द्रियानसंवेद्यान् पष्यन्त्यार्षेण चक्षुषा।
ये भावं वचनं तेषां नानुमानेन बाध्यते।।

श्री कैयट ने उपर्युक्त दो श्लोकों का उद्धरण दिया है, उनका तात्पर्य यह है कि सदाचारादि के अनुष्ठान से जिसकी अविद्या की निवृत्ति हो गई, योगाभ्यास के निरंतर अनुष्ठान से जिसको सर्व वस्तु-विशयक ज्ञान का आविर्भाव हो गया है और विहित कर्मों के अनुष्ठान से जिसका अंतःकरण विषुद्ध हो गया है, उसका अतीत/भूत और अनागत/भविष्य का जो ज्ञान है, वह प्रत्यक्ष से कुछ विषेश नहीं होता अर्थात् विद्यमान वस्तुविशयक जो हम लोगों का प्रत्यक्ष है, उससे विषिष्ट नहीं होता अर्थात् विद्यमान वस्तु का प्रत्यक्ष ज्ञान जिसप्रकार हम लोगों को होता है, उसी प्रकार भूत-भविष्यद् वस्तु का भी ज्ञान उन लोगों को हो जाता है।’’ -(स्फोटदर्षन, पृ. 46)। यह अवधारणा जैन परंपरा में पल्लवित बिल्कुल केवलज्ञान या केवलज्ञानी-जैसी दिखती है। शब्दब्रह्म के उपासक वैयाकरणों ने पूरे ब्रह्म को ही शब्द रूप माना और उसे स्फोट से प्रकट होने वाला कहा। ऐसे ही वह आत्मा, जो परमात्मा होने जा रही है और जिससे शरीर की पर्याय त्रैकालिक रूप में छूटकर, अनंत चतुष्टय रूप होने जा रही है और तब वह अनंत ज्ञानमय भी होने जा रही है और जब वह आत्मा अपने सर्वत्व से अनंत ज्ञानमय होगी, तो जो ज्ञान प्रकट होगा, वह भी सर्वत्व से ही होगा, न कि मुख-भर से, हाँ, यह जरूर हो सकता है कि उस समय उसका सर्वत्व ही मुख की भूमिका में कार्य करने लगता है या करने लगे, इसलिए कहा जाता है कि दिव्यवाणी जिनेन्द्र देव के मुख से या चारों मुखों से प्रस्फुटित हो रही थी। शब्दब्रह्म की दूसरी विषेशता है कि यह ऊँकारमय नादरूप होता है। भाव यह लsa कि यह नाद शब्द और अर्थ का समवेत रूप होता है, इसीलिए वाक्यपदीयम् में कहा गया है कि यह जो वाणी है वह सभी शब्दों की वाचक है, आदि-आदि-
वाच्या सा सर्वशब्दानां शब्दाच्च न पृथक् ततः।
अपृथक्त्वेपि सम्बन्धस्तयोर्ननात्मनोरिव।।

दूसरे प्रश्‍नचिह्नत बिंदु का उत्तर भी दिव्यध्वनि की इसी समरूप विषेशता में सन्निहित है अर्थात् दिव्यध्वनि को भी हमारी परंपरा एकाक्षरी ऊँकारमय निनाद-स्वरूप मानती है, भाव यह है कि यह ऐसी एकाक्षरी भाषा की बनी है कि जो प्रकृति में बहु-अक्षरी न होने के कारण अनक्षरी तथा ऊँकारमय होने के कारण ऐसी अक्षरी, जो सर्वभाषा रूप परिणत हो सकने वाली अर्थात् सर्वभाषामय व किसी भी एक भाषा के गुणों वाली न होने के कारण अभाषात्मक कही जाती है। जैसे वैयाकरणों का स्फोट-अर्थ-प्ररूपक है, वैसे ही यह दिव्यध्वनि भी अनंत अर्थ-प्ररूपक है और परा व पष्यंती रूप वाणी की प्रायः सभी विषेशताएँ इस दिव्यध्वनि में दिखतीं हैं। धवलाकार के शब्दों में-
तेसिमणेयाणं बीजपदाणं दुवालसंगप्पयाणमट्ठारससत्तसयभास- कुभासरूवाणं परूवओ
अत्थकत्तारणां, बीजपदणिलीणत्थपरूवयाणं दुवालसंगाणं कारओ, गणहरभंडारओ गंथकत्तारो त्ति अव्भुवगमादो। -धवला, 9-4-1-44-126-8

इसी को कविवर द्यानतराय जी ने अपनी देव, षास्त्र व गुरु की पूजा में यों कहा है- जिनकी धुनि है ऊँ-कार रूप, निर-अक्षरमय महिमा अनूप। दश-अष्ट महाभाषा-समेत, लघुभाषा सात शतक सुचेत। सो स्याद्वादमय सप्तभंग, गणधर गूँथे बारह सु-अंग। रवि-शषि न हरै सो तम हराय, सो शास्त्र नमों बहु प्रीति ल्याय।।

इसलिए मुझे तो लगता है कि हो न हो, वैयाकरणों ने अपनी स्फोट और शब्दब्रह्म की अवधारणा दिव्यध्वनि के स्वरूप को विचार कर गढ़ी है।

अभी तक मुझे लगता था कि भाषा से संसार है अर्थात् भाषा ही संसार को संसार बनाती है, इसीलिए मेरी मान्यता थी कि भाषा न हो, तो संसार संसार न हो या संसार संसार न रह जाए, पर अब मुझे लगने लगा है कि भाषा से ही संसार है और भाषा से ही मोक्ष है और भाषा न हो, तो संसार संसार न हो अर्थात् संसार संसार न रह जाएगा या न रह पाएगा और मोक्ष भी संसारियों के लिए काम का मोक्ष न हो पाएगा, क्योंकि समोशरण में तीर्थंकर की दिव्य ध्वनि यदि न खिरती, तो अनेक देशों में उत्पन्न मनुष्यों, देवों और पशुओं के संदेह का नाश होकर धर्म के स्वरूप का कथन न होता/न हो पाता और जब ऐसा न होता, तो मोक्ष होता, तो होता, परंतु संसारियों के लिए काम का मोक्ष न होता। यह तो सर्व-भाषा-मय लेकिन निरक्षरा दिव्य ध्वनि ही है, जो मोक्ष को हम संसारियों के लिए काम का बनाती है। इसीलिए मैं तो बार-बार कहता हूँ कि भाषा से जुड़ो, भाषा को पहचानो, भाषा को साधो और भाषा से ठीक तरह से जुड़ गए, तो आपकी चर्या वह न रह जाएगी, जो आज है, क्योंकि आप भाषा से जब ठीक तरह से जुड़ जाएँगे, तो वह आपके विचार को प्रभावित करेगी और जब आपका विचार प्रभावित होगा, तो आपका आचरण अपने-आप बदल जाएगा, ऐसी स्थिति में आपकी जो चर्या होगी, वह होगी रत्नत्रयी चर्या तथा इसप्रकार जब आपकी रत्नत्रयी चर्या हो गई, तो मोक्ष तो अपने-आप होगा ही, इसीलिए मुझे तो बार-बार लगता है कि दोस्तो! भाषा से ही संसार है और भाषा से ही मोक्ष। चूँकि भाषा प्रतीकों की बनी होती है या भाषिक संप्रेशण के माध्यम प्रतीक बनते हैं और भाषा में ये प्रतीक प्रमुख रूप में तीन तरह के दिखते हैं- 1- स्वयं के बोधक चिह्न रूप, 2- एकार्थी संकेत रूप, व 3- अनेकार्थी प्रतीक रूप। जब तक संसार है, तब तक उसके प्रतीक-संकेत या तो एकार्थी होते हैं या बह्वर्थी और जैसे ही मोक्ष होता है, तो वे केवल स्वयं के बोधक रह जाते हैं अर्थात् चिह्न रूप में सीमित हो जाते हैं- चिह्नीभूतं त्वभिज्ञानम्, इसीलिए जैन परंपरा में परमात्म-अवस्था की आत्मा केवल अपने अनंत-चतुष्टय स्वरूप रूप स्वयं की बोधक मानी गई है। यही कारण है कि भाषा से ही संसार है, दिव्यध्वनि रूप भाषा से ही मोक्ष की साधना और उसी के चितवन से तद्रूप मोक्ष की प्राप्ति और इसीलिए केवली के द्वारा निगदित दिव्यध्वनि की भावना भी सर्व कल्याण के कारण सर्वभाषामय बनी।

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