वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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दिव्‍यध्‍वनि : संगणकविज्ञान (Computer Science) और मशीनी अनुवाद (Machine Translation) के परिप्रेक्ष्‍य में
                                                                                                              
                                                                                                                
-वृषभ प्रसाद जैन

भगवज्जिनेन्द्र को जब केवलज्ञान की प्राप्ति होती है, तदनन्तर समवसरण में उनके सर्वांग से एक विचित्र गर्जना रूप ऊँकारमय ध्वनि खिरती है, जिसे दिव्यध्वनि कहा जाता है। यद्यपि यह मान्यता बहुत साफ नहीं है, तथापि हरिवंशपुराण में (3/16-38) दिव्यध्वनि को प्रातिहार्यो में तथा सर्वमागधी भाषा को देवकृत अतिशयों में गिना गया है, जबकि तिलोयपण्णत्ति में यह उल्लेख मिलता है कि अठारह महाभाषाओं तथा सात सौ क्षुद्र भाषाओं से युक्त दिव्यध्वनि केवलज्ञान के ग्यारह अतिशयों में से एक है (ति.प. 4/899-906), जो भी हो, यहाँ यह प्रश्न विवेच्य नहीं है कि दिव्यध्वनि प्रातिहार्यों का अंग है अथवा केवलज्ञान के अतिशयों का ?..... अथवा केवल ज्ञान होने पर होने वाले देवकृत अतिशयों का ?...... पर इस बिन्दु पर सभी आचार्य एक-मत हैं कि अरहन्त भगवान के उपदेश देने की सभा समवसरण के परकोटे में सभी आगम्यमान यथा- तिर्यंच, मनुष्य व देव आदि जीव निश्चित प्रकोष्ठ में ही भगवज्जिनेन्द्र की अमृतवाणी से कर्णों को तृप्त करने के लिए बैठते हैं और वहाँ बैठकर सभी अपनी-अपनी भाषा में परिणम्यमान वाणी में अपनी-अपनी शंकाओं का समाधान भी श्री गणधर देव के माध्यम से पाते हैं और सब की समष्टि रूप में एक-जैसी ही, पर वस्तुतः प्रत्येक की अलग-अलग यह अनुभूति होती है कि भगवज्जिनेन्द्र हमारी भाषा में हम को ही लक्ष्य कर कह रहे हैं। यहाँ महत्‍वपूर्ण यह है कि यह सब को कहने के माध्यम श्री गणधर देव ही बनते हैं (परोवदेसेण बिना अक्खरणक्खरसरूवासेसभासम् तर कुसलो समवसरणजणमेत्तरूवधारित्तणेण अम्हम्हाणम् भाषाहि अम्हम्हाणं चेव कहदि त्ति सव्वेसिं पच्च उप्पायओ समवसरणजणसोदिंदिएसु सगमुहविणिग्गयाणेय भासाणं संकरेण पवेसस्स विणवारओ गणहरदेवो गंथकत्तारो -धवला 9/4, 1, 44/128/6)। इस बिन्दु पर भी जैन परम्परा के सभी आचार्य एक-मत हैं कि केवलज्ञान से अलंकृत भगवत् जिनेन्द्र निखिल ब्रह्माण्ड के ज्ञान के निधान हैं, इसीलिए तो कोई भी भव्य जीव अपनी किसी भी शंका का में पाता है। कम्प्यूटर के विकास के मूल में वैज्ञानिकों का प्रारम्भ से लेकर निरन्तर यह बहुत स्पष्ट लक्ष्य रहा है कि ’हम कम्प्यूटर को एक ऐसे ज्ञानस्रोत के रूप में विकसित करके रहेंगे/करेंगे, जिसमें अखिल ब्रह्माण्ड की सकल जानकारी इस रूप में रख दी जाएगी’ और इसी दिशा में संगणक-वैज्ञानिक निरन्तर गतिशील रहे हैं तथा कुछ अंशों में लक्ष्य की प्राप्ति भी उन्होंने की है। इसीलिए कम्प्यूटरविज्ञान में डाटाबेस से ऊपर उठकर एक और महत्त्वपूर्ण धारणा Knowledge Base ज्ञानस्रोत की बहुत तेजी से नये रूप में उभरकर आयी है। अब प्रश्न उठता है कि इस लक्ष्य की परिकल्पना का विचार कम्प्यूटर के वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में कैसे उभरा सच पूछिए तो यह बात बहुत स्पष्ट है कि पश्चिमी जगत् वैचारिक रूप में उतना समृद्ध नहीं है, जितना कि भारत। इसका कारण बहुत स्पष्ट है कि उनकी साहित्य-संस्कृति की परम्परा उतनी समृद्ध नहीं है, जितनी कि भारत की। एक और कारण है कि आज की तथाकथित अपने को आधुनिक कहलाने वाली पीढ़ी का सबसे बड़ा दोष है कि स्नोवसंस्कृति Snovculture के लोग जिससे लेते हैं, उसके प्रति मन से कृतज्ञता ज्ञापित भी नहीं करना चाहते हैं। इसीलिए सामान्यतः वे दातार को स्मरण ही नहीं करते हैं और यदि कहीं भूल से स्मरण करना पड़ जाए, तो केवल वाचिक-स्तर पर धन्यवाद देकर अलग हो जाते हैं। एक कारण और है कि हम तथाकथित आधुनिक कहे जाने वाले लोग पूर्वाग्रह के साथ परम्परा की सारी मान्यताओं को रूढ़ि या दकियानूसी मानकर चलते हैं, इसलिए उनमें यदि कोई बात महत्त्व की है भी, तो उसे महत्त्वपूर्ण मानने में अपनी हेठी मानते हैं। यही इन संगणक-वैज्ञानिकों के साथ हुआ; अन्यथा समवसरण में विद्यमान केवलज्ञानी जिनेन्द्र के स्वरूप की धारणा के ठीक समान लक्ष्य की धारणा बिना जैन परम्परा के नामोल्लेख के नहीं पनपती। खुले मस्तिष्क से यहाँ यह सम्भावना भी व्यक्त करते हैं कि जिन लोगों के वैचारिक सम्पर्क से स़़ंगणक-वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में यह विचार विकसित हुआ कि उन्होंने अपने वैचारिक आदान-प्रदान में संगणक-वैज्ञानिकों को इस धारणा के साथ जैन परम्परा का बोध न कराया हो, यदि ऐसा है तो हजारों वर्षों से इस परम्परा को सुरक्षित रखने वाले शास्त्र हमारे सम्मुख हैं, आज ही हम उन्हें स्वीकार कर लें।
यहीं मैं सम्प्रेषणविज्ञान Communication Science की बात और करना चाहता हूँ कि सम्प्रेषणविज्ञान की यह प्रमुख मान्यता है कि सम्प्रेषण अव्यवस्था में नहीं होता, सम्प्रेषण की अपनी व्यवस्था होती है, या सम्प्रेषण के लिए व्यवस्था आवश्यक है। यह व्यवस्था होती है ग्रहीता-सापेक्ष्य, “Whom to address” सापेक्ष्य। मान लीजिए कि आपको कोई बात पहुँचानी है उन दश लोगों तक, जो भिन्न-भिन्न प्रमुख भाषाओं के जानकार हैं, तो क्या उन्हें एक-साथ एक-कक्ष में सम्बोधा जा सकेगा? ............................. नहीं, यह सम्भव नहीं। भिन्न-भिन्न प्रमुख भाषाओं के हमें भिन्न-भिन्न वर्ग बनाने होंगे और तब हम सम्बोधन का कार्य प्रारम्भ करेंगे। यहीं यह भी ज्ञातव्य है कि प्रत्येक वर्ग के ग्रहीताओं (Recipient) को केन्द्र में रखकर हमें भिन्न-भिन्न प्रकार के Port विकसित करने होंगे, जो एक ही स्रोत-सामग्री को भिन्न-भिन्न प्रकार से परिवर्तित करने में सक्षम होने चाहिए। इसीलिए आज का संगणकविज्ञान सम्प्रेषणविज्ञान का अंग है और सम्प्रेषण्विज्ञान की सम्प्रेषणीयता का लक्ष्य व्यवस्था में ही पूरा होता है। ठीक इसी सम्प्रेषणीय व्यवस्था को लक्ष्य में रखकर समवसरण के परकोटे में विभिन्न भाषिक वर्गों के लिए विभिन्न प्रकेाष्ठों की व्यवस्था में ही भगवत् जिनेन्द्र की वाणी खिरती है, उसके बाहर/समवसरण के बाहर नहीं।
आज से लगभग सौ साल पहले समवसरण-सभा की इस धारणा को तथाकथित वैज्ञानिक आँख से देखने वाले या विचार करने वाले लोगों के द्वारा कपोल-कल्पना माना जाता था और ठिप्पणी की जाती थी कि कहीं यह भी सम्भव है कि जहाँ वक्ता एक भाषा में बोल रहा हो और भिन्न-भिन्न भाषाओं के ग्रहीता अपनी-अपनी भाषा में उस कथन को सुन रहे हों, जैसी कि मान्यता है कि ‘‘जिनेन्द्र के सर्वांग से निगदित वाणी को सब अपनी-अपनी भाषा में सुन रहे होते हैं- ’’आज संगणक-वैज्ञानिकों ने उपर्युक्त सोच रखने वाले लोगों को मशीनी अनुवाद की धारणा देकर चुनौती ही नहीं दी है, बल्कि उन्हें एक करारा उत्तर भी दिया है। मशीनी अनुवाद के मूल में यह परिकल्पना है कि जिस दिन हम पूरी तरह मशीनी अनुवाद का तन्त्र विकसित कर लेंगे, उस दिन कोई भी संगणक (मशीन) उपलब्ध होगी, तो भी मशीन हमें किसी भी स्रोतभाषा से अपेक्षित लक्ष्यभाषा में उसका अनूदित रूप स्वतः उपलब्ध करा देगी। हमने अब तक मशीनी अनुवाद के जो तन्त्र विकसित किये हैं, उनमें इस दिशा में हमें बहुत-अंशों में सफलता भी मिली है। अब आगे हम मशीनी अनुवाद के वर्तमान में उपलब्ध तन्त्रों की कुछ मान्यताओं को लेकर इस चर्चा को कुछ-और आगे बढ़ाएँगे।
सामान्य भाषा-प्रयोक्ता के भाषा-प्रयोग के पीछे उसके मन की, उसकी विवक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। बल्कि यूँ कहा जा सकता है कि विवक्षा के बिना भाषा मूर्त रूप ही नहीं ले सकती, यह भाषा- प्रयोक्ता के मन की विवक्षा ही है कि वह उसे भाषा-प्रयोग तक पहुँचाती है, इसलिए यहाँ तक कहा जाता है कि मन की विवक्षा के बिना भाषा-व्यवहार सम्भव ही नहीं है। भाषा-प्रयोग की यह प्रकृति एक लम्बे समय से मशीनी अनुवाद के क्षेत्र में कार्य कर रहे संगणक-वैज्ञानिको के लिए समस्या बनी रही है और है कि भाषा-प्रयोग को कम्प्यूटर से सम्भव बनाने के लिये मानव-मन को, उसकी विवक्षा को कम्प्यूटर में कैसे ढाला जाए?......................इस समस्या पर कार्य करनेवाला संगणक-वैज्ञानिकों का एक वर्ग अब यह मानकर चल रहा है कि संगणक से भाषायी संसाधन (Language Processing) के लिए कम्प्यूटर में मन को ढालने (Implement) की जरूरत ही नहीं है, वहीं दूसरा वर्ग मन को ढालने की बात की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास कर रहा है। यहीं दिव्यध्वनि की यह मान्यता बड़े महत्त्व की है व उद्धरणीय है कि दिव्यध्वनि के लिए मन या विवक्षा का होना आवश्यक नहीं है। इसीलिए तो महापुराण में यह उल्लेख मिलता है कि -‘‘भगवान् की वह वाणी बोलने की इच्छा के बिना ही प्रकट हो रही थी’’(विवक्षणामन्तरेणास्य विविक्तासीत् सरस्वती-महापुराण 24/84, 1/186)। मन के अभाव के सम्बन्ध में धवला में यह उल्लेख मिलता है कि उपचार से मन के द्वारा सत्य और अनुभय इन दोनों प्रकार के वचनों की उत्पत्ति का विधान किया गया है। (असतो मनसः कथं वचनद्वितय समुत्पत्तिरिति चेन्न, तस्य ज्ञानकार्यत्वात्।-धवला 1/1, 1.50/284/2) तथा अरहंतपरमेष्ठी में मन के अभाव होने पर मन के कार्य रूप वचन की संभाव्यता के संदर्भ में धवला की मान्यता है कि वचन मन के कार्य नहीं हैं, बल्कि ज्ञान के कार्य हैं। (तत्र मनसोऽभावे तत्कार्यस्य वचसोऽपि न सत्त्वमिति चेन्न, तस्य ज्ञानकार्यत्वात्। -धवला, 1/1, 1.112/368/3) इसीलिए यह आवश्यक है कि मशीनी अनुवाद की दिशा में कार्य कर रहे संगणक-वैज्ञानिकों को संगणक में मन को ढालने का प्रयास न करते हुए ज्ञानस्रोत के रूप में उसे विकसित करना चाहिए। अब यहीं एक शंका और मन में उठती है कि जब सामान्य भाषायी प्रयोग में मन की भूमिका है, तो मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया में मन को क्यों न जोड़ा जाए? ................. इसका समाधान यह है कि मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया में निवेश्य सामग्री (Inputable materials) के रूप में भाषायी प्रयोग, जो अनूदित होना है, स्वयंप्राप्त होता है, जबकि सामान्य भाषायी सृजन में विचार या घटना निवेश्य सामग्री के रूप में प्राप्त होती है, और विचार या घटना को भाषायी रूप देने के लिए विवक्षा तथा मन की आवश्यकता होती है, जबकि मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया यान्त्रिक है, दूसरे- मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया के अनन्तर अनूदित रूप में प्राप्त होने वाले वचन ज्ञान का विषय बने वचनों का परिणाम होंगे, न कि मन का विषय हुए विचार या घटना का परिणाम, अतः यह स्पष्ट है कि मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया में मन या विवक्षा की अपेक्षा नहीं है।
दिव्यध्वनि और संगणक-विज्ञान के कुछ समतुल्य बिन्दु और हैं कि जिस प्रकार समुचित दीक्षित गणधर के बिना दिव्यध्वनि नहीं खिरती है और गणधर महाराज द्विभाषिये का काम करते हैं, ठीक वैसे ही संगणक के अनुप्रयोगों को सम्पादित करने के लिए हमें समुचित दीक्षित प्राकलनकर्ता (Programmer) की अपरिहार्य आवश्यकता होती है और वह समुचित दीक्षित प्राकलनकर्ता सामान्य प्रयोक्ताओं की आवश्यकताओं के सम्पादनार्थ माध्यम का कार्य करता है। जिसप्रकार दिव्यध्वनि अक्षर और अनक्षर उभय रूप होती है (अक्खराणक्खरप्पिया। -कषायपाहुड 1/1/516/126/2) ठीक उसी प्रकार कम्प्यूटर की भाषा को विकसित करने के लिए इसके स्वरूप को अक्षरात्मक तथा अनक्षरात्मक भी माना गया है। जिस प्रकार दिव्यध्वनि का प्रगटना विशिष्ट समय व अवस्थादि में होता है, उसी प्रकार संगणक के समुचित प्रयोग के लिए संगणक वैज्ञानिकों की मान्यता है कि विशिष्ट समय व विशिष्ट परिस्थितियों का ध्यान रखा जाये। जिस प्रकार दिव्यध्वनि के विषय में यह मान्यता है कि वह स्वयं अर्थ रूप न होकर, अर्थ-निरूपक होती है। इसलिए इसमें नानाप्रकार के हेतुओं के द्वारा भव्य जीवों की शंका समाधान के लिए निरूपण किया जाता है। (णाणाविहहेदूहिं दिव्यझुणी भणइ भव्वाणं।-तिलोयपण्णत्ति 4/905) ठीक वैसे ही संगणकीय भाषाएँ स्वयं अर्थ-रूप नहीं होती हैं और मशीनी अनुवाद की प्रक्रिया में संगणक-वैज्ञानिकों का एक वर्ग यह भी मानता है कि अनुवाद की प्रक्रिया में हमें अर्थ के संसाधन की बात नहीं करनी चाहिए, क्‍योंकि अर्थ का स्थान/आश्रय सांसारिक जीवों का/मनुष्यों का मस्तिष्क ही है या हो सकता है, कोई यन्त्र या मशीन नहीं । इसलिए अर्थ को मशीन से संसाधित करने का व्यर्थ का दबाव मशीन पर नहीं डाला जाना चाहिए। जिसप्रकार के भव्यजीवों के शंका निवारणार्थ साधन बनी अभाषात्मक दिव्यध्वनि भव्यजीवों का विषय बनकर सामान्य-भाषात्मक हो जाती है, ठीक उसी प्रकार प्राकलन की भाषाएँ (Programming Language) सामान्य भाषा की व्यवस्था को अपने में न संजोये-हुए अभाषात्मक होते हुए भी भाषायी संसाधन का माध्यम होने के कारण भाषात्मकता से जुड़ी रहती हैं। जिस प्रकार भव्य जीव अपनी शंकाओं के निवारणार्थ अनन्त ज्ञान के भण्डार पर आधृत दिव्यध्वनि की शरण लेते हैं, ठीक उसी प्रकार आज के युग के संगणक-वैज्ञानिकों की यह मूल परिकल्पना रही है कि जब हम पूरीतरह ज्ञानस्रोत विकसित कर लेंगे, जिसे जिज्ञासा होगी, वह मानव अपनी शंकाओं के समाधान के लिए संगणक के अन्नत ज्ञानकोष की शरण लेगा। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि आज के संगणक-विज्ञान व मशीनी अनुवाद की अधिकांश मान्यताएँ दिव्यध्वनि के मुल सोच पर आधारित हैं या यों कहें कि इसके विकास में कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में दिव्यध्वनि के सोच की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। यहीं यह भी महत्त्वपूर्ण अनुसंधेय है कि संगणक-वैज्ञानिकों को अपने संगणकीय तंत्र को विकसित करने के लिए दिव्यध्वनि के स्वरूप को और-सूक्ष्म तथा विशद रूप में विवेचित करते हुए अपने वैज्ञानिक विकास का आधार बनाना चाहिए।
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