वृषभ प्रसाद जैन, प्रोफेसर एवं निदेशक, भाषा केन्‍द्र
Vrashabh Prasad Jain, Professor & Director, Bhasha Kendra

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अन्तर्राष्ट्रीय भाषा दिवस पर कुछ विचार
डॉ. वृषभ प्रसाद जैन

21 फरवरी को अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाने की घोषणा सबसे पहले 17नवम्बर 1999 को यूनेस्को के द्वारा हुई। इसके पीछे लक्ष्य यह था कि सम्पूर्ण विश्व मिलकर पूरे विश्व की सांस्कृतिक एवं भाषिक विविधताओं को पोषित करेगा, जिससे कि वैश्विक परिदृश्य में बहुभाषिकता एवं बहु-सांस्कृतिकता सम्वर्द्धित होगी। इस पूरी संकल्पना के पीछे भाव यह था कि किसी भी मनुष्य की अभिव्यक्ति की भाषा हीन नहीं है, सभी की अभिव्यक्ति की माध्यम भाषाएँ एक-सा महत्त्व रखती हैं, इसलिए जन जन की भाषा का संरक्षण एवं सम्वर्द्धन होना चाहिए। यद्यपि इसकी घोषणा 1999 में ही हो गयी थी फिर-भी  संयुक्त राष्ट्र की सामान्य सभा के द्वारा इसका प्रस्ताव2008 में स्वीकृत हुआ था। यद्यपि यह भी तथ्य-पूर्ण है कि शांति और बहुभाषिकता को पल्लवित एवं पोषित करने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय दिवस वर्ष 2000 से मनाया जाना प्रारम्भ हुआ, परन्तु यहीं महत्त्वपूर्ण यह भी है कि वर्ष 1952 में 21 फरवरी के दिन ही ढाका विश्व विद्यालय, जगन्नाथविश्वविद्यालय और ढाका चिकित्सा महाविद्यालय के अनेक छात्र शहीद मीनार स्थल पर ढाका उच्च न्यायालय के पास पूर्वी पकिस्तान और आज के बंगला देश में बंगला भाषा को राष्ट्र की भाषा को घोषित किये जाने वाले अन्दोलन के दौरान गोलियों से पुलिस के द्वारा भून दिये गए थे। इसलिए 21फरवरी का दिन बृहत्तर भारत की एक भाषा या भाषायी आजादी के शहीदी दिवस के रूप में भी है।

 वैश्विक परिदृश्य में मातृभाषा के लिए तीन पारिभाषिकों यथा- १- मदर लैंग्वेज, २. मदर टंग, ३. नेटिव लैंग्वेज का प्रयोग मिलता है। प्रश्न है कि मातृभाषा किसे माना जाए-- माँ की भाषा को,नवजात शिशु की प्रथम भाषा को या जिस समाज में व्यक्ति पल्लवित हुआ, उस समाज के संस्कार से सीखी गई जातीय भाषा को या भाषा परिवार की किसी पिछली भाषा को।  भाषाविज्ञान में मान्यता यह भी है कि भाषा परिवार की किसी प्राचीन भाषा को भी मातृभाषा माना जाता है, जिससे कि  उस भाषा परिवार की सभी भाषाएँ विकसित हुई हों। मातृभाषा के लिए यूरोप की रोमन भाषाओं में लैंग्वा मदरेना (स्पैनेस), लिंग्वा मद्रे (इटेलियन) और लंग्वे मटेरने (फ्रेन्च) आदि शब्दों का व्यवहारहोता है, जिससे ऐसा लगता है कि मातृभाषा शब्द का अलग अलग भाषाओं में अलग अलग तरह से प्रयुक्त होते हुए भी प्रायश: सभी भाषाओं में कुछ संरचनात्मक समानता लिये हुए भी है। यद्यपि ये पारिभाषिक संरचनात्मक दृषिट से अलग अलग दिखने वाले हैं, परंतु मूल में ये एक मूलभूत संरचना व वैचारिक अवधारणा को लिये हुये ही हैं । यूनेस्को अपने प्रतिवर्ष के अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के लिए, जो कि  21 फरवरी को मनाया जाता है, एक विशेष अवधारणा का निर्धारण करता है, जिस अवधारणा पर सम्पूर्ण विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस केन्द्रित होता है। यद्यपि विश्व के विभिन्न देश अपने अपने देश की मातृभाषा को लेकर अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाते हैं, परंतु सब का अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाया जाना एक-सा नहीं होता। सब अपनी अपनी तरह से इसे मनाते हैं। यूनेस्को अपनी निर्धारित अवधारणा को लेकर कुछ कार्यक्रमों को भी विभिन्न देशों में प्रायोजित भी करता है। कुल मिलाकर पूरे संसार में इस अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस  के उत्सव को मनाने को लेकर अनेक तरह के कार्यक्रम पल्लवित हुए हैं । कुछ-कुछ देश अन्तर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर पुरस्कार भी इस दिन प्रदान करते हैं। वर्ष 2006 में सिडनी में इस अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के दिन एक स्मारक स्थापित हुआ था।

जैसे- माँ का दूध और वात्सल्य बच्चे का पोषण करता है, ठीक वैसे ही हर मनुष्य के साथ उसके जन्म लेने के तुरन्त बाद से ही एक भाषा का संस्कार उसके भीतर होने लगता है और दुनिया की अधुनातन खोजों ने यह सिद्ध किया है कि यह भाषा ही उस व्यक्ति विशेष के व्यक्तित्व  की पोषक माँ की तरह बनाती है, इसलिए इसे ही मातृभाषा कहा जाना चाहिए। 

बैंकूवर, कनाडा में रहने वाले बंगाली मूल के श्री  रफीकूल इस्लाम साहब ने अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के प्रस्ताव को सुझाया था और अभिव्यक्ति की विविधताओं में संप्रेषण की एकता को ध्यान रखते हुए उन्होंने 9 जनवरी 1998 को एक पत्र संयुक्त राष्ट्र के मिस्टर कॉफी अन्नान को लिखा था, जिसमें दुनिया की सभी भाषाओं के  संरक्षण और उनके मृत होने के खतरे से रक्षा की बात भी कही थी। भाषा आन्दोलन के ढाकाई इतिहास के मद्दे नजर 21 /फरवरी/1952, जो कि ढाका का भाषायी शहीदी दिवस था, श्री  रफीकूल इस्लाम साहब ने इसी दिन को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा दिवस के रूप में मनाने की बात कही थी।

भाषाएँ मनुष्य की पहचान होती हैं, भाषाएँ मरती  हैं, तो मनुष्य की पहचान मरती है,धूमिल होती है और कालान्तर में नष्टप्राय होती है। यह अन्तर्राष्ट्रीय भाषा दिवस हमें मनुष्य मात्र की सांस्कृतिक एकता अर्थात् सम्पूर्ण विश्व की मानव संस्कृति और मनुष्य मात्र की संप्रेषणात्मक एकात्मता के पोषण के लिए भाषायी विविधताओं एवं सम्पूर्ण विश्व की सांस्कृतिक विविधताओं की बात करता है; जो भारत के वसुधैक-नीडम्, वसुधैव कुटुम्बकं एवं विश्व बन्धुत्व के नारे को पोषित करता है।   

यह दिवस केवल बंगलादेश में ही नहीं, सम्पूर्ण विश्व में यथा- चिले, रूस, इजिप्ट और कनाडा में भी मनाया जाता है। इस प्रकार भाषाओं और सांस्कृतिक विविधताओं को लेकर उन्हें संरक्षित व सम्वर्धित करने के निमित्त हम विभिन्न कार्यक्रम पूरे विश्व भर में मनाते हैं। मूल बात यह है कि पूरे वैश्विक पटल पर भाषायी और सांस्कृतिक विविधताओं को देखते हुये भी इस दिन हम एक प्रकार के भाषायी और सांस्कृतिक एकात्मवाद को उत्सव के रूप में देखते हैं। इस मातृभाषा दिवस का लक्ष्यविश्व-भर की अनेक भाषाओं और संस्कृतियों के होते हुए भी हम संप्रेषणात्मक एकात्मवाद तथा मनुष्य मात्र के पोषण की संस्कृति को सम्वर्धित करने की दिशा में आगे बढ़ने का है। कुल मिलाकर हम केवल'स्व को देखने तक अपने आपको सीमित नहीं रखते, पर ध्यान इस बात पर भी है कि हम 'स्व को भूलें भी नहीं, बल्कि यह भाषाओं के स्वत्व की पहचान को वैश्विक संदर्भ में देखने और पल्लवित करने का पर्व है और इसप्रकार यह अपनी भाषा की पहचान को रक्षित एवं पोषित करते हुए सभी मातृभाषाओं को आदर देने का उत्सव भी है। इसीलिए सब ओर से इस दिन ध्वनि आती है- जय मातृभाषा, जय मातृभाषा दिवस।

इस अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के पीछे एक भाव और रहा है कि हम ऐसा यत्न करें कि विश्व की सभी मातृभाषाओं में शैक्षिक तंत्र विकसित हो, क्योंकि सिद्धांत है कि मातृभाषा के पोषण से ही व्यक्ति  एवं देश का सम्यक् पोषण होता है और ऐसे परिणाम भी आज विभिन्न देशों के संदर्भ में देखने में आए हैं, पर आजादी के इतने वर्षों  बाद भी हम भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं कर पाए। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयीय संगठन ने भारतीय भाषा मंच के साथ मिलकर भारत की विभिन्न मातृभाषाओं को लेकर इस दिशा में आगे बढ़कर माध्यमिक स्तर पर शैक्षिक तंत्र विकसित करने की दिशा में कदम उठाये हैं, इसलिए वह बधार्इ का पात्र है।
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